Saturday, 9 May 2020

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।
तदेव व्यासतो ब्रूहि भस्ममाहात्म्यमुत्तमम्।।1।।

तथा रुद्राक्ष माहात्म्यं नाममाहात्म्य मुत्तमम्।
त्रितयं ब्रूहि सुप्रीत्या ममानन्दय मानसम्।।2।।

ऋषिबोले- महाभाग व्यासशिष्य सूतजी!आपको नमस्कार है। अब आप उस परम उत्तम भस्म माहात्म्य, रुद्राक्ष  माहात्म्य तथा उत्तम नाम माहात्म्य - इन तीनों का परम् प्रसन्नता पूर्वक प्रतिपादन कीजिये और हमारे हृदय को आनंद दीजिये।।1-2।।

सूत उवाच

साधु पृष्टं भवद्भिश्च लोकानां हितकारकम्।
भवन्तो वै महाधन्याः पवित्राः कुलभूषणाः।।3।।
येषां चैव शिवः साक्षाद् दैवतं परमं शुभम्।
सदाशिव कथा लोके वल्लभा भवतां सदा।।4।।

सूतजी ने कहा महर्षियो!आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। यह समस्त लोकों के लिये हितकारक विषय है। वे धन्य, पवित्र और कुल के भूषण हैं जिनके साक्षात शिवजी ही परम देवता हैं और जिनको लोक में शिवजी की कथा सदैव प्रिय है।।3-4।।

ते धन्याश्च कृतार्थाश्च सफलं देहधारणम्।
उद्धृतं च कुलं तेषां ये शिवं समुपासते।।5।।

जो शिवजी की उपासना करते हैं वे धन्य हैं, कृतार्थ हैं। उनका मनुष्य देह धारण करना सफल है। उन्होंने अपने कुल का उद्धार किया है।।5।।

शिवनाम मुखे यस्य सदा शिवशिवेति च।
पापानि न स्पृशन्त्येव खदिराङ्गारकं तथा।।6।।

जिनके मुख में सदा शिव-शिव नाम है, उनको पाप ऐसे स्पर्श नहीं करते हैं जैसे खैर अंगार को स्पर्श नहीं कर सकते।।6।।

श्रीशिवाय नमस्तुभ्यं  मुखं व्याहरते यदा।
तन्मुखं पावनं तीर्थं सर्वपापविनाशनम्।।7।।

श्री शिवजी के निमित्त नमस्कार है-ऐसा जो कोई कहता है, उसका पावन मुख तीर्थ सब पापों का नाश करने वाला है।।7।।

तन्मुखं च तथा वै पश्यति प्रीतिमान्नरः।
तीर्थजन्यं फलं तस्य भवतीति सुनिश्चितम्।।8।

जो प्रीतिमान मनुष्य उस शिवभक्त के मुख को देखता है, उसे तीर्थ का फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।।8।।

यत्र त्रयं सदा तिष्ठेदेतच्छुभतरं द्विजाः।
तस्यदर्शन मात्रेण वेणीस्नानफलं लभेत्।।9।।

हे ब्राह्मणो! यह शुभ प्राणी जहाँ-जहाँ स्थित होता है, इसके दर्शन मात्र से त्रिवेणी स्नान का फल प्राप्त होता है।।9।।

शिवनामविभूतिश्च तथा रुद्राक्ष एव च।
एत्त्रयं महापुण्यं त्रिवेणी सदृशं स्मृतम्।।10।।

शिवनाम, विभूति तथा रुद्राक्ष  ये तीनों महापवित्र त्रिवेणी के फल के समान हैं।।10।।

एतत्त्रयं शरीरे च यस्य तिष्ठति  नित्यशः।
तस्यैव दर्शनं लोके दुर्लभं पापहारकं।।11।।

इन तीनों को जो शरीर में स्थित नित्य देखता है, उस पापहारी मनुष्य का दर्शन लोक में दुर्लभ है।।11।।

तद्दर्शनं यथा वेणी नोभयोरन्तरं मनाक्।
एवं यो न विजानाति स पापिष्ठो न संशयः।।12।।

उस शिवभक्त का दर्शन त्रिवेणी के समान है, इसमें कुछ भी अन्तर नहीं है। जो ऐसा नहीं जानता वह पापीष्ठ है, इसमें सन्देह नहीं है।।12।।

विभूतिर्यस्य नो भाले नाङ्गे रुद्राक्ष धारणम्।
नास्ये शिवमयी वाणी तं त्यजेदधमं यथा।।13।।

जिसके मस्तक पर विभूति नहीं, अङ्ग में रूद्राक्ष नहीं, मुख में शिवमयी वाणी नहीं,उसे अधम के समान त्याग दे।।13

शैवं नाम यथा गङ्गा विभूतिर्यमुना मता।
रुद्राक्षं विधिना प्रोक्ता सर्वपापविनाशिनी।।14।।

भगवान शिव का नाम गङ्गा है, विभूति यमुना मानी गयी हैं तथा रुद्राक्ष को सरस्वती कहा गया है। इन तीनों की संयुक्त त्रिवेणी समस्त पापों का नाश करने वाली है।।14।।

शरीरे च त्रयं यस्य तत्फलं चैकतः स्थितम्।
एकतो वेणिकायाश्च स्नानजं तु फलं बुधैः।।15।।

जिसके शरीर में यह तीनों हैं, उसका फल इसमें स्थित है, एक से ही त्रिवेणी के स्नान का फल पण्डितों ने कहा है।।15।।

तदेवं तुलितं पूर्वं ब्रह्मणा हितकारिणा।
समानंचैव तज्जातं तस्माद् धार्यं सदा बुधैः।।16।।

ब्रह्माजी ने जगत के हित के निमित्त इसकी तौल की है, तो बराबर ही हुआ था, इस कारण पण्डितों को सदा विभूति धारण करनी चाहिये।।16।।

तद्दिनं हि समारभ्य ब्रह्मविष्ण्वादिभिः सुरैः।
धार्यते त्रितयं तच्च दर्शनात्पापहारकम्।।17।।

 उस दिन से लेकर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने इन तीनों के धारण का नियम किया है, जो दर्शन से ही पाप हरने वाली है।।17।।

ऋषय ऊचुः

ईदृशं हि फलं प्रोक्तं नामादित्रितयोद्भवम्।
तन्माहात्म्यं विशेषेण वक्तुमर्हसि सुव्रत।।18।।

ऋषि बोले-जब तीनों के नामों का ऐसा फल कहा है, तो हे सुब्रत! विशेष करके उनका माहात्म्य आप हमसे कहिये।।18।।

सूत उवाच

ऋषयो हि महाप्राज्ञाः सच्छैवा ज्ञानिनां वराः।
तन्माहात्म्यं हि सद्भक्त्या श्रृणुतादरतो द्विजाः।।19।।

सूत जी बोले- हे ऋषियो आप महापण्डित, ज्ञानियों में श्रेष्ठ शिव जी के भक्त हो, आप आदर से इनका माहात्म्य श्रवण कीजिये।।19।।

सुगूढमपि शास्त्रेषु पुराणेषु श्रुतिष्वपि।
भवत्स्नेहान्मया विप्राः प्रकाशः क्रियतेऽधुना।।20।।

यह शास्त्र, पुराण और श्रुतियों में गूढ़ है। हे  ब्राह्मणो! आपके स्नेह से मैं अब प्रकट करता हूँ।।20।।

कस्तत्त्रितयमाहात्म्यं सञ्जानाति द्विजोत्तमाः।
महेश्वरं विना सर्वं ब्रह्माण्डे सदसत्परम्।।21।।

 हे ब्राह्मणो! कौन सम्पूर्णता से इन तीनों का माहात्म्य जान सकता है? इस ब्रह्मांड में केवल सत-असत से परे शिवजी ही जानते हैं।।21।।

वच्म्यहं नाम माहात्म्यं यथा भक्ति समासतः।
श्रृणुत प्रीतितो विप्राः सर्वपापहरं परम्।।22।।

यथाशक्ति संक्षेप से मैं नाम माहात्म्य कहता हूँ। हे ब्राह्मणो!उस सब पाप हरने वाले नाम की महिमा प्रीति से सुनिये।।22।।

शिवेति नामदावाग्नेर्महापातक पर्वताः।
भस्मीभवन्त्यनायासात्सत्यं सत्यं न  संशयः।।23।।

'शिव' इतना नाम ही पाप रूपी महा पर्वतों को जलाने के लिए दावाग्नि है। नाम लेते ही पाप अनायास दग्ध हो जाते हैं, यह सत्य है, इसमें संदेह नहीं है।।23।।

पापमूलानि दुःखानि विविधान्यपि शौनक।
शिवनामैकनश्यानि नान्यनश्यानि सर्वथा।।24।।

हे शौनकजी! पाप से उत्पन्न हुए अनेक प्रकार के दुख हैं, वे एक शिवजी के नाम से नष्ट हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।।24।।

स वैदिकः स पुण्यात्मा स धन्यः स बुधो मतः।
शिवनामजपासक्तो यो नित्यं भुवि मानवः।।25।।

 वही वैदिक, वही पुण्यआत्मा, वही धन्य और पंडित है, जो नित्य पृथ्वी पर शिवनाम का जप करता है।।25।।

भवन्ति विविधा धर्मास्तेषां सद्यः फलोन्मुखाः।
येषां भवति विश्वासः शिवनाम जपे मुने।।26।।

मुने! जिनका शिवनाम जप में विश्वास है, उनके द्वारा आचरित नाना प्रकार के धर्म तत्काल फल देने के लिए उत्सुक हो जाते हैं।।26।।

पातकानि विनश्यन्ति यावन्ति शिवमानतः।
भुवि तावन्ति पापानि क्रियन्ते न नरैर्मुने।।27।।

महर्षे! भगवान शिव के नाम से जितने पाप नष्ट होते हैं उतने पाप मनुष्य इस भूतल पर कर नहीं सकते ।।27।।

ब्रह्महत्यादिपापानां राशीनप्रमितान्मुने।
शिवनाम द्रुतं प्रोक्तं नाशयत्यखिलान्नरैः।।28।।
हे मुने!ब्रह्महत्यादि पापों के ढेर भी शिवनाम के लेते ही नष्ट हो जाते हैं।।29।।

शिवनामतरीं प्राप्य संसाराब्धिं तरन्ति ये।
संसार मूलपापानि तानि नश्यन्त्यसंशयम्।।29।।

 जो शिव नाम रूपी नौका पर आरूढ़ हो संसार रूपी समुद्र को पार करते हैं, उनके जन्म मरण रूप संसार के मूलभूत वे सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।इसमें संशय नहीं है।।29।।

संसारमूलभूतानां पातकानां महामुने।
शिवनामकुठारेण विनाशो जायते ध्रुवम्।।30।।

हे! महामुने संसार की मूलभूत पातक रूपी वृक्ष का शिव नाम रूपी कुठार से निश्चय ही नाश हो जाता है।।30।।

शिवनामामृतं पेयं पापदावानलार्दितैः।पापदावाग्नितप्तानां शान्तिस्तेन विना न हि।।31।।

जो पाप रूपी दावानल से पीड़ित हैं, उन्हें शिव नाम रूपी अमृत का पान करना चाहिये। पापों के दावानल से दग्ध होने वाले लोगों को उस शिव नामामृत के बिना शान्ति नहीं मिल सकती।।31।।


शिवेति नाम पीयूषवर्षधारापरिप्लुताः।
संसारदवमध्येऽपि न शोचन्ति कदाचन।।32।।

जो शिव नाम रूपी सुधा की वृष्टि जनित धारा में गोते लगा रहे हैं, वे संसार रूपी दावानल के बीच में खड़े होने पर भी कदापि शोक के भागी नहीं होते।।32।।

शिवनाम्नि महद्भक्तिर्जाता येषां महात्मनाम्।
तद्विधानां तु सहसा मुक्तिर्भवति सर्वथा।।33।।

 जिन महात्माओं के मन में शिव नाम के प्रति बड़ी भारी भक्ति है ऐसे लोगों की सहसा और सर्वथा मुक्ति होती है।।33।।

अनेकजन्मभिर्येन तपस्तप्तं मुनीश्वर।
शिवनाम्नि भवेद्भक्तिः सर्वपापहारिणी।।34।।

हे! मुनीश्वर जिसने अनेक जन्मों तक तपस्या की है, उसी की शिव नाम के प्रति भक्ति होती है, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है।।34।।

यस्यासाधारणी शम्भुनाम्नि भक्तिरखण्डिता।
तस्यैवमोक्षः सुलभो नान्यस्येति मतिर्मम।।35।।

जिसके मन में भगवान शिव के नाम के प्रति कभी खण्डित न होने वाली असाधारण भक्ति प्रकट हुई है, उसी के लिये मोक्ष सुलभ है। यह मेरा मत है।।35।।

कृत्वाप्यनेकपापानि शिवनाम जपादरः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो भवत्येव न संशयः।।36।।

जो अनेक पाप करके भी भगवान शिव के नामजप में आदरपूर्वक लग गया है, वह समस्त पापों से मुक्त हो ही जाता है, इसमें संशय नहीं है।।36।।

भवन्ति भस्मसाद् वृक्षा दवदग्धा यथा वने।
तथा तावन्ति दग्धानि पापानि शिवनामतः।।37।।

जैसे वन में दावानल से दग्ध हुए वृक्ष भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार शिवनाम रूपी दावानल से दग्ध होकर उस समय तक के सारे पाप भस्म हो जाते हैं।।37।।

यो नित्यं भस्मपूताङ्गः शिवनामजपादरः।
स तरत्येव संसारमघोरमपि शौनक।।38।।

शौनक! जिसके अंग नित्य भस्म लगाने से पवित्र हो गये हैं तथा जो शिव नामजप का आदर करने लगा है, वह घोर संसार सागर को भी पार कर ही लेता है।।38।।

ब्रह्मस्वहरणं कृत्वा हत्वापि ब्राह्मणान्बहून।
न लिप्यते नरः पापैः शिवनामजपादरः।।39।।

ब्राह्मणों का द्रव्य हरण करके, ब्राह्मणों को मारकर भी शिव नाम भक्ति से जपने वाला पाप से लिप्त नहीं होता है।।39।।

विलोक्य वेदानखिलान् शिवनामजपः परः।
संसारतरणोपाय इति पूर्वैर्विनिश्चतम्।।40।।

 संपूर्ण वेदों का अवलोकन करके पूर्ववर्ती महर्षियों ने यही निश्चित किया है कि भगवान शिव के नाम का जप संसार सागर को पार करने के लिए सर्वोत्तम उपाय है।।40।।

किं बहूक्त्त्या मुनिश्रेष्ठाः शलोकेनैकेन वच्म्यहम्।
शिवाभिधान माहात्म्यं सर्वपापापहारणम्।।41।।

पापानां हरणे शम्भोर्नाम्नः शक्तिर्हि यावती।
शक्नोति पातकं तावत्कर्तुं नापि नरः क्वचित्।।42।।

मुनिवरो! अधिक कहने से क्या लाभ, मैं शिव नाम के सर्व पापहारी माहात्म्य का एक ही श्लोक में वर्णन करता हूंँ।भगवान शंकर के एक नाम में भी पाप हरण की जितनी शक्ति है, उतना पातक मनुष्य कभी कर ही नहीं सकता।।41-42।।

शिवनामप्रभावेण लेभे सद्गतिमुत्तमाम्।
इन्द्रद्युम्ननृपः पूर्वं महापापयुतो मुने।।43।।

 मुने! पूर्व काल में महा पापी राजा इंद्रद्युम्न ने शिवनाम के प्रभाव से ही उत्तम सद्गति प्राप्त की थी।।43।।

तथा काचिद् द्विजा योषाऽसौ मुने बहुपापिनी।
शिवनाम प्रभावेण लेभे सद्गतिमुत्तमाम।।44।।

इत्युक्तं वो द्विजश्रेष्ठा नाम माहात्म्य मुत्तमम्।
श्रृणुध्वं भस्ममाहात्म्यं सर्वपावनपावनम्।।45।।

इसी तरह कोई ब्राह्मणी युवती भी जो बहुत पाप कर चुकी थी, शिव नाम के प्रभाव से ही उत्तम गति को प्राप्त हुई। द्विजवरो! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान नाम के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया है। अब तुम भस्म का माहात्म्य सुनो, जो समस्त पावन वस्तुओं को भी पावन करने वाला है।।44-45।।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वर संहितायां साध्यसाधन खण्डे शिवनाम माहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः।।23।।

🙏🏿जय बाबा की।🙏🏿
बाबाचरण दास

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ द्वाविंशोऽध्यायः

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथ द्वाविंशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

अग्राह्यं शिवनैवेद्यमिति पूर्वं श्रुतं वचः।
ब्रूहि तन्निर्णयं बिल्व माहात्म्यमपि सन्मुने।।1।।

ऋषि बोले-  मुने!हमने पहले से यह बात सुन रखी है कि भगवान शिव का नैवेद्य ग्रहण नहीं करना चाहिये। इस विषय में शास्त्र का निर्णय क्या है, यह बताइये। साथ ही बिल्व का माहात्म्य भी प्रकट कीजिये।।1।।

सूत उवाच

श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे सावधानतयाधुना।
सर्वं वदामि सम्प्रीत्या धन्या यूयं शिवव्रताः।।2।।

सूत जी ने कहा-- मुनियो!आप शिव सम्बन्धी व्रत का पालन करने वाले हैं। अतः आप सबको शतशः धन्यवाद है। मैं प्रसन्नता पूर्वक सब कुछ बताता हूँ। आप सावधान होकर सुनें।।2।।

शिवभक्तः शुचिः शुद्धः सद्व्रती दृणनिश्चयः।
भक्षयेच्छिवनैवेद्यं त्यजेदग्राह्यभावनाम्।।3।।

जो भगवान शिव का भक्त है, बाहर भीतर से पवित्र और शुद्ध है, उत्तम व्रत का पालन करने वाला तथा दृढ़ निश्चय से युक्त है, वह शिवनैवेद्य का अवश्य भक्षण करे। भगवान शिव का नैवेद्य अग्राह्य है, इस भावना को मन  से निकाल दे।।3।।

दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः।
भुक्ते तु शिवनैवेद्ये पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।4।।

शिव के नैवेद्य को देख लेने मात्र से भी सारे पाप दूर भाग जाते हैं, उसको खा लेने पर तो करोड़ों पुण्य अपने भीतर आ जाते हैं।।4।।

अलं  यागसहस्त्रेणाप्यलं यागार्बुदैरपि।
भक्षिते शिवनैवेद्यै शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।5।।

सहस्र और अरब यज्ञ करने से  क्या है? शिवजी का नैवेद्य भक्षण करने से मनुष्य को शिवजी के सायुज्य की प्राप्ति होती है।।5।।

यदगृहे शिवनैवेद्यप्रचारोऽपि  प्रजायते।
तद्गृहं पावनं सर्वमन्यपावनकारणम्।।6।।

जिसके घर में शिवनैवेद्य का प्रचार है, वह घर महापवित्र है और वह दूसरे घरों को भी पवित्र कर देता है।।6।।

आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा।
भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरणपूर्वकम्।।7।।

आगतं शिवनैवेद्यमन्यदा ग्राह्यमित्यपि।
विलम्बे पापसम्बन्धो भवत्येव हि मानवः।।8।।

आये हुए शिवनैवेद्य को सिर झुकाकर प्रसन्नता के साथ ग्रहण करे और प्रयत्न करके शिव स्मरण पूर्वक उसका भक्षण करे। आये हुए शिवनैवेद्य को जो यह कहकर कि मैं इसे दूसरे समय में ग्रहण करूँगा, लेने में विलंब कर देता है, वह मनुष्य निश्चय ही पाप से बँध जाता है।।7-8।।

न यस्य शिवनैवेद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।
स पापिष्ठः गरिष्ठः स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।9।।

शिवनैवेद्य ग्रहण में जिसकी इच्छा नहीं होती, वह महापापी अवश्य नरक में पड़ता है।।9।।

हृदये चन्द्रकान्ते च स्वर्णरूप्यादिनिर्मिते।
शिवदीक्षावता भक्तेनेदं भक्ष्यमितीर्यते।।10।।

हृदय में सुवर्ण, चाँदी आदि की बनी हुई चन्द्रकान्त वाले शिवभक्त से यह भक्षण करने योग्य है, ऐसा कहा जाता है।।10।।

शिवदीक्षान्वितो भक्तो महाप्रसादसंज्ञकम्।
सर्वेषामपि लिङ्गानां नैवेद्यं भक्षयेच्छुभम्।।11।।

अन्यदीक्षायुजां नृणां शिवभक्तिरतात्मनाम्।
श्रृणुध्वं निर्णयं प्रीत्या शिवनैवेद्यभक्षणे।।12।।

जिसने शिव पूजन की दीक्षा ली हो, उस शिवभक्त के लिये यह शिव नैवेद्य अवश्य भक्षणीय है। शिव की दीक्षा से युक्त शिवभक्ति पुरुष के लिये सभी शिवलिङ्गों का ,नैवेद्य शुभ एवं महाप्रसाद है, अतः वह उसका अवश्य भक्षण करे। परंतु जो अन्य देवताओं की दीक्षा से युक्त हैं और शिवभक्ति में भी मन को लगाये हुए हैं, उनके लिये शिवनैवेद्य  भक्षण के विषय में क्या निर्णय है इसे आप लोग प्रेमपूर्वक सुनें।।11-12।।

शालग्रामोद्भवे लिङ्गे रसलिङ्गे तथा द्विजाः।
पाषाणे राजते स्वर्णे सुरसिद्धप्रतिष्ठिते।।13।।

काश्मीरे स्फाटिके रात्ने ज्योतिर्लिङ्गेषु सर्वशः।
चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शम्भोर्नैवेद्यभक्षणम्।।14।।

ब्राह्मणों! जहाँ से शालग्राम शिला की उत्पत्ति होती है, वहाँ के उत्पन्न लिङ्ग में, रसलिङ्ग (पारदलिङ्ग) में, पाषाण, रजत तथा सुवर्ण से निर्मित लिङ्ग में, देवताओं तथा सिद्धों द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग में, केसर निर्मित शिवलिङ्ग में, स्फटिक लिङ्ग में, रत्ननिर्मित लिङ्ग में तथा समस्त ज्योतिर्लिङ्गों में विराजमान भगवान शिव के नैवेद्य का भक्षण चान्द्रायण व्रत के समान पुण्यजनक है।।13-14।।

ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत्।
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति।।15।।

ब्रह्महत्या करने वाला पुरुष भी यदि पवित्र होकर शिव निर्माल्य का भक्षण करके उसे (सिर पर) धारण करे तो उसका सारा पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।।15।।

चण्डाधिकारो यत्रास्ति  तद्भोक्तव्यं न मानवैः।
चण्डाधिकारो नो यत्र भोक्तव्यं तच्च भक्तितः।।16।।

पर जहाँ चण्ड का अधिकार है, वहाँ जो शिव निर्माल्य हो , उसे साधारण मनुष्यों को नहीं खाना चाहिये। जहाँ चण्ड का अधिकार नहीं है, वहाँ के शिव निर्माल्य का सभी को भक्तिपूर्वक भोजन करना चाहिये।।16।।

बाणलिङ्गे च लौहे च सिद्धे लिङ्गे स्वयम्भुवि।
प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत्।।17।।

बाणलिङ्ग(नर्मदेश्वर), लोहनिर्मित (स्वर्णादि धातुमय) लिङ्ग, सिद्धलिङ्ग (जिन लिङ्गों की उपासना से किसी ने सिद्धि प्राप्ति की है अथवा जो सिद्धों द्वारा स्थापित हैं वे शिवलिङ्ग) स्वयम्भूलिङ्ग इन सब लिङ्गों में  तथा शिवजी की प्रतिमाओं में चण्ड का अधिकार नहीं है।।17।।

स्नापयित्वा विधानेन यो लिङ्गस्नपनोदकम्।
त्रिःपिबेत्त्रिविधं पापं तस्येहाशु विनश्यति।।18।।

जो मनुष्य शिवलिङ्ग को विधिपूर्वक स्नान कराकर उस स्नान के जल का तीन बार आचमन करता है, उसके कायिक, वाचिक एवं मानसिक तीनों प्रकार के पाप यहाँ शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।।18।।

अग्राह्यं शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम्।
शालग्राम शिलासङ्गात्सर्वं याति पवित्रताम्।।19।।

जो शिवनैवेद्य, पत्र, पुष्प, फल और जल अग्राह्य है, वह सब भी शालग्राम शिला के स्पर्श से पवित्र, ग्रहण के योग्य हो जाता है।।19।।

लिङ्गोपरि च यद् द्रव्यं तदग्राह्यं मुनीश्वराः।
सुपवित्रं च तज्ज्ञेयं यल्लिङ्गस्पर्शबाह्यतः।।20।।

मुनिवरो! शिवलिङ्ग के ऊपर चढ़ा हुआ जो द्रव्य है, वह अग्राह्य है। जो वस्तु शिव लिङ्ग स्पर्श से रहित है अर्थात जिस वस्तु को अलग रखकर शिवजी को निवेदित किया जाता है, लिङ्ग के ऊपर नहीं चढ़ाया जाता, उसे अत्यंत पवित्र जानना चाहिये।।20।।

नैवेद्य निर्णयः प्रोक्त इत्थं वो मुनिसत्तमाः।
श्रृणुध्वं बिल्वमाहात्म्यं सावधानतयादरात्।।21।।

महादेवस्वरूपोऽयं बिल्वो देवैरपि स्तुतः।
यथाकथञ्चिदेतस्य महिमा ज्ञायते कथम्।।22।।

अब तुम लोग सावधान हो आदरपूर्वक बिल्व का माहत्म्य सुनो। यह बिल्व वृक्ष महादेव का ही रूप है। देवताओं ने भी इसकी स्तुति की है। फिर जिस किसी तरह से इसकी महिमा कैसे जानी जा सकती है।।21-22।। 

पुण्यतीर्थानि यावन्ति लोकेषु प्रथितान्यपि।
तानि सर्वाणि तीर्थानि बिल्वमूले वसन्ति हि।।23।।

बिल्वमूले महादेवं लिङ्ग रूपिणमव्ययम्।
यः पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद् ध्रुवम्।।24।।

तीनों लोकों में जितने पुण्यतीर्थ प्रसिद्ध हैं, वे सम्पूर्ण तीर्थ बिल्व के मूल भाग में निवास करते हैं। जो पुण्य आत्मा मनुष्य बिल्व के मूल में  लिङ्गस्वरूप अविनाशी महादेव जी का पूजन करता है, वह निश्चय ही शिव पद को प्राप्त कर लेता है।।23-24।।

बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति।
स सर्वतीर्थस्नातः स्यात्स एव भुवि पावनः।।25।।

एतस्य बिल्व मूलस्याथालवालमनुत्तमम्।
जलाकुलं महादेवो दृष्ट्वा तुष्टो भवत्यलम्।।26।।

जो बिल्व की जड़ के पास जल से अपने मस्तक को सींचता है, वह सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान का फल पा लेता है और वही इस भूतल पर पावन माना जाता है। इस बिल्व की जड़ के परम उत्तम थाले को जल से भरा हुआ देखकर महादेव जी पूर्णतया संतुष्ट होते हैं।25-26।।

पूजयेद् बिल्वमूलं यो गन्धपुष्पादिभिर्नरः।
शिवलोकमवाप्नोति सन्ततिर्वधते सुखम्।।27।।

बिल्वमूले दीपमालां यः कल्पयति सादरम्।
स तत्त्वज्ञान सम्पन्नो महेशान्तर्गतो भवेत्।।28।।

जो मनुष्य गन्ध, पुष्प आदि से बिल्व के मूल भाग का पूजन करता है वह शिवलोक को पाता है और इस लोक में भी उसकी सुख संतति बढ़ती है। जो बिल्व की जड़ के समीप आदर पूर्वक दीपावली जलाकर रखता है, वह तत्वज्ञान से संपन्न हो भगवान महेश्वर में मिल जाता है।।27-28।।

बिल्व शाखां समादाय हस्तेन नवपल्लवम्।
गृहीत्वा पूजयेद् बिल्वं स च पापैः प्रमुच्यते।।29।।

बिल्वमूले शिवरतं भोजयेद्यस्तु भक्तितः।
एकं वा कोटिगुणितं तस्य पुण्यं प्रजायते।।30।।

जो बिल्व की शाखा थामकर हाथ से उसके नये-नये पल्लव उतारता और उनसे उस बिल्व की पूजा करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।जो बिल्व की जड़ के समीप भगवान शिव में अनुराग रखने वाले एक भक्त को भी भक्ति पूर्वक भोजन कराता है, उसे कोटि गुना पुण्य प्राप्त होता है।।29-30।।

बिल्वमूले क्षीरयुक्तमन्नमाज्येन    संयुतम्।
यो दद्याच्छिवभक्ताय स  दरिद्रो न जायते।।31।।

साङ्गोपाङ्गमिति प्रोक्तं शिवलिङ्ग प्रपूजनम्।
प्रवृत्तानां निवृत्तानां भेदतो द्विविधं द्विजाः।।32।।

जो बिल्व की जड़ के पास शिव भक्त को खीर और घृत से युक्त अन्न देता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने  साङ्गोपाङ्ग  शिवलिङ्ग पूजन का वर्णन किया। यह प्रवृत्ति मार्गी तथा निवृति मार्गी पूजकों के भेद से दो प्रकार का होता है।।31-32।।

प्रवृत्तानां पीठपूजा सर्वाभीष्टप्रदा भुवि।
पात्रेणैव प्रवृत्तस्तु सर्वपूजां समाचरेत्।।33।।

नैवेद्यमभिषेकान्ते शाल्यन्नेन समाचरेत्।
पूजान्ते स्थापयेल्लिङ्गं पुटे शुद्धे पृथग्गृहे।।34।।

प्रवृत्ति मार्गी लोगों के लिए पीठ पूजा इस भूतल पर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को देने वाली होती है। प्रवृत्त पुरुष सुपात्र गुरु आदि के द्वारा ही सारी पूजा सम्पन्न करे और अभिषेक के अन्त में अगहनी के चावल से बना हुआ नैवेद्य निवेदन करे। पूजा के अंत में शिवलिंङ्ग को शुद्ध सम्पुट में विराजमान करके घर के भीतर कहीं अलग रख दे।।33-34।।

करपूजानिवृत्तानां स्वभोज्यं तु निवेदयेत्।
निवृत्तानां परं सूक्ष्मं लिङ्गमेव विशिष्यते।।35।।

विभूत्यभ्यर्चनं कुर्याद्विभूतिं च निवेदयेत्।
पूजां कृत्वा तथा लिङ्गं शिरसा धारयेत्सदा।।36।।

निवृत्ति मार्गी उपासकों के लिए हाथ पर ही शिव पूजन का विधान है। उन्हें भिक्षा आदि से प्राप्त हुए अपने भोजन को ही नैवेद्य रूप में निवेदित कर देना चाहिए। निवृत्त पुरुषों के लिए सूक्ष्म लिङ्ग ही श्रेष्ठ बताया जाता है। वे विभूति से पूजन करें और विभूति को ही नैवेद्य रूप से निवेदित भी करें। पूजा करके उस शिवलिङ्ग को सदा अपने मस्तक पर धारण करें।।35-36।।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वर संहितायां साध्यसाधन खण्डे शिवनैवेद्यवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः।।22।।

🙏🏿जय बाबा की।🙏🏿
बाबाचरण दास

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथैकविंशोऽध्यायः

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथैकविंशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

सूत सूत महाभाग व्यास शिष्य नमोस्तु ते।
सम्यगुक्तं त्वया तात पार्थिवार्चा विधानकम्।।1।।
कामना भेदमाश्रित्य सङ्ख्यां ब्रूहि विधानतः।
शिवपार्थिवलिङ्गानां कृपया दीनवत्सल।।2।।

ऋषि बोले-
हे महाभाग सूतजी! हे व्यास शिष्य! आपको नमस्कार है। आपने भली प्रकार पार्थिवपूजा का विधान कहा है। अब आप कामना भेद के अनुसार शिवजी के पार्थिव लिङ्ग की पूजा का वर्णन कीजिये। हे दीन वत्सल!आप हमारे ऊपर कृपा कीजिये।।1-2।।

सूत उवाच

श्रृणुध्वमृषयः सर्वे पार्थिवार्चा विधानकम्।
यस्यानुष्ठानमात्रेण कृतकृत्यो भवेन्नरः।।3।।

अकृत्वा पार्थिवं लिङ्गं योऽन्यदेवं प्रपूजयेत्।
वृथा भवति सा पूजा दमदानादिकं वृथा।।4।।

सूत जी बोले-हे समस्त ऋषियो ! पार्थिवपूजा का विधान सुनिये, जिसके अनुष्ठान से यह प्राणी कृतकृत्य जो जाता है। बिना पार्थिवलिङ्ग की पूजा किये जो दूसरे देवताओं की पूजा करता है, उसकी वह पूजा और दम-दानादिक वृथा हो जाते हैं।।3-4।।

सङ्ख्या पार्थिवलिङ्गानां यथाकामं निगद्यते।
सङ्ख्या सद्यो मुनिश्रेष्ठ निश्चयेन फलप्रदा।।5।।

पार्थिवलिङ्ग की संख्या कामना के अनुसार कही गयी है। हे मुनिश्रेष्ठो! विशेष करके यह संख्या निश्चय से अधिक फल देने वाली है।।5।।

प्रथमा वाहनं तत्र प्रतिष्ठा पूजनं पृथक।
लिङ्गाकारं समं तत्र सर्वं ज्ञेयं पृथक्पृथक।।6।।

पहले आवाहन, फिर प्रतिमा पूजन प्रतिष्ठा करनी चाहिये। लिंगाकार के समान पृथक पृथक पूजन करना चाहिये।।।।6।।

विद्यार्थी पुरुषः प्रीत्या सहस्त्रमितपार्थिवम्।
पूजयेच्छिवलिङ्गं हि निश्चयात्तत्फलप्रदम्।।7।।

विद्यार्थी पुरुष प्रसन्न होकर सहस्र पार्थिवलिङ्ग वनाकर पूजे तो निश्चय ही वह पूजन फल देने वाला होगा।।7।।

नरःपार्थिवलिङ्गानां धनार्थी च तदर्धकम्।
पुत्रार्थी सार्धसाहस्त्रं वस्त्रार्थी शतपञ्चकम्। ।8।।

धन की इच्छा वाला पांचसौ, पुत्रार्थी पन्द्रह सौ, वस्त्रार्थी पांच सौ पार्थिव शिवलिङ्गों का पूजन करे।।8।।

मोक्षार्थी कोटिगुणितं भूकामश्च सहस्त्रकम्।
दयार्थी च त्रिसाहस्त्रं तीर्थार्थी द्विसहस्त्रकम्।।9।।
सुहृत्कामी त्रिसाहस्त्रं वश्यार्थी  शतमष्टकम्।
मारणार्थी सप्तशतं मोहनार्थी शताष्टकम्।।10।।
उच्चाटनपरश्चैव सहस्त्रं च यथोक्तः।
स्तम्भनार्थी सहस्त्रं तु द्वेषणार्थी तदर्धकम्।।11।।
निगडान्मुक्तिकामस्तु सहस्त्रं सार्धमुत्तमम्।
महाराजभये पञ्चशतं ज्ञेयं विचक्षणैः।।12।।

मोक्ष की इच्छा वाला एक करोड़, पृथ्वी की कामना वाला  एक सहस्त्र,दया की इच्छा वाला तीन सहस्त्र, तीर्थ की इच्छा वाला दो सहस्त्र,सुहृदय की इच्छा वाला तीन सहस्त्र, वशीकरण की इच्छा वाला आठ सौ, मारण की इच्छा वाला सात सौ, मोहन की इच्छा वाला आठ सौ, उच्चाटन में एक सहस्त्र, स्तंभन में एक सहस्त्र, द्वेष में पाँच सौ,  बंधन से छूटने की इच्छा वाला डेढ़ सहस्त्र, महाराज से भय होने में पाँच सौ पार्थिव शिवलिङ्ग पूजन करे।।।9-10-11-12।।

चौरादिसंकटे ज्ञेयं पार्थिवानां  शतद्वयम्।
डाकिन्यादिभये पञचशतमुक्तं  च पार्थिवम्।।13।।
दारिद्र्ये पञ्साहस्त्रमयुतं सर्वकामदम्।
अथ नित्यविधिं वक्ष्ये श्रृणु्ध्वं मुनिसत्तमाः।।14।।
एकंपापहरं प्रोक्तं द्विलिंङ्गं चार्थसिद्धिदम्।
त्रिलिंङ्गं सर्वकामानां कारणं परमीरितम्।।15।।
उत्तरोत्तरमेवं स्यात्पूर्वोक्त गणनावधि।
*मतान्तरमथो वक्ष्ये सङ्ख्यायां मुनिभेदतः।।16।।

विद्वान पुरुष चोर और राजा की भय में दो सौ, डाकिनी आदि के भय में पांच सौ,  दरिद्रता में पांच सहस्र, सब काम में दस सहस्र शिवलिङ्ग पूजे। हे मुनि श्रेष्ठो! अब मैं नित्य विधि कहता हूँ आप सुनिए एकलिंग पाप हारी, दो अर्थ सिद्ध करने वाले, तीन लिंग शुभकामनाओं के परम कारण कहे हैं। यह पूर्वोक्त गणना की विधि उत्तरोत्तर जाननी है। संख्या में मुनियों के भेद से मतान्तर का वर्णन करते हैं।।13-14-15-16।।

लिङ्गानामयुतं कृत्वा पार्थिवानां सुबुद्धि मान्।
निर्भयो हि भवन्नूनं महाराजभयं हरेत्।।17।।
कारागृहादिमुक्त्त्यर्थमयुतम् कारयेद् बुधः।
डाकिन्यादिभये सप्तसहस्त्रं कारयेत्तथा।।18।।
अपुत्रः पञ्चपश्चात् सहस्त्राणि  प्रकारयेत्।
लिङ्गानामयुतेनैव कन्यकासन्ततिं लभेत्।।19।।

लिङ्गानामयुतेनैव विष्ण्वाद्यैश्वर्यमाप्नुयात्।
लिङ्गानाम प्रयुतेनैव ह्यतुलां श्रियमाप्नुयात्।।20।।

 बुद्धिमान पुरूष दस सहस्त्र  पार्थिव  शिवलिङ्ग बनाकर निर्भय होकर महाराज के भय से दूर होता है। कारागृह से छूटने के निमित्त दस सहस्त्र पार्थिव  शिवलिङ्ग पूजन करे। डाकिनी आदि के भय में सात सहस्त्र पार्थिव  शिवलिङ्ग बनावे। पुत्र के निमित्त पचपन सहस्त्र पार्थिव  शिवलिङ्ग का पूजन करें। दस सहस्त्र पार्थिव  शिवलिङ्ग के पूजन से कन्या संतान होती है। दस सहस्त्र पार्थिव शिवलिङ्ग के पूजन से विष्णु जी के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा दस सहस्त्र पार्थिव  शिवलिङ्ग लिंगों के पूजन से अतुल ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।।17-18-19-20।।

कोटिमेकां तु लिङ्गानां यः करोति नरो भुवि।
शिव एव भवेत्सोऽपि नात्र कार्या विचारणा।।21।।

जो मनुष्य एक कोटि शिवलिङ्ग का पूजन करता है, वह शिवरूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है।।21।।

अर्चा पार्थिव लिङ्गानां कोटियज्ञ फलप्रदा।
भुक्तिदा मुक्तिदा नित्यं ततः कामार्थिनां नृणाम्।।22।।

पार्थिव शिवलिङ्ग की पूजा कोटि यज्ञों के फल देने वाली है। कामार्थी मनुष्यों को नित्य भुक्ति मुक्ति देने वाली है।।22।।

विना लिङ्गार्चनं यस्य कालो गच्छति नित्यशः।
महाहानिर्भवेत्तस्य दुर्वृत्तस्य दुरात्मनः।।23।।

जिसका समय लिङ्गार्चन के बिना व्यतीत होता है, उस दुरात्मा दुर्वृति की मानहानि होती है।।23।।

एकतः सर्वदानानि व्रतानि विविधानि च।
तीर्थानि नियमा यज्ञा लिङ्गार्चा चैकतः स्मृता।।24।।

एक ओर तो सब दान और व्रत हैं तथा तीर्थ, नियम और यज्ञ हैं और एक ओर शिवलिङ्ग पूजन है।।24।।

कलौ लिङ्गार्चनं श्रेष्ठं यथा लोके प्रदृश्यते।
तथान्यन्नास्ति शास्त्राणामेष सिद्धान्त निश्चयः।।25।।

पार्थिव शिवलिङ्ग की पूजा कोटि कोटि यज्ञों का फल देने वाली है। कलियुग में लोगों के लिए शिवलिङ्ग पूजन जैसा श्रेष्ठ दिखाई देता है वैसा दूसरा कोई साधन नहीं है। यह समस्त शास्त्रों का निश्चित सिद्धांत है।।25।।

भुक्ति मुक्तिप्रदं लिङ्गं विविधापन्निवारणम्।
पूजयित्वानरो नित्यं शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।26।।

शिवलिङ्ग भोग और मोक्ष देने वाला है तथा अनेक विपत्तियों का निवारण करता है। नित्य शिवलिङ्ग पूजन करके मनुष्य शिवजी के सायुज्य को प्राप्त होता है।।26।।

शिवनाममयं लिङ्गं नित्यं पूज्यं महर्षिभिः।
यतश्च सर्व लिङ्गेषु तस्मात्पूज्यं विधानतः।।27।।

शिवनाममय शिवलिङ्ग की पूजा महर्षियों को नित्य करनी चाहिये, जैसा कि  शिवलिङ्ग में विधान से पूजन कहा गया है।।27।।

उत्तमं मध्यमं नीचं त्रिविधं लिङ्गमीरितम्।
मानतो मुनिशार्दूलास्तच्छृणुध्वं वदाम्यहम्।।28।।

शिवलिङ्ग तीन प्रकार के कहे गए हैं उत्तम, मध्यम और अधम। यह इसका मान है। हे मुनिजनो ! इसका प्रमाण श्रवण कीजिये।।28।।

चतुरङ्गुलमुशच्छृयं रम्यं वेदिकया युतम्।
उत्तमं लिङ्गमाख्यातं मुनिभिः शास्त्रकोविदैः।।29।।

शास्त्र जानने वालों ने मनोहर वेदी से युक्त चार अंगुल ऊँचा शिवलिङ्ग उत्तम कहा है।।29।।

तदर्द्धं मध्यमंप्रोक्तं तदर्द्धंमधमं स्मृतम्।
इत्थं त्रिविधमाख्यातमुत्तरोत्तरतः परम्।।30।।

उससे आधा मध्यम और उससे आधा अधम है। इस प्रकार उत्तरोत्तर  शिवलिङ्ग तीन प्रकार का कहा है।।30।।

अनेक  लिङ्गं यो नित्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितः।
पूजयेत्स लभेत्कामान्मनसा मानसेप्सितान्।।31।।

जो भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर अनेक शिवलिङ्ग  का पूजन करता है। वह सम्पूर्ण मनोकामनाओं को प्राप्त होता है।।31।।

न लिङ्गाराधनादन्यत्पुण्यं वेदचतुष्टये।
विद्यते सर्वशास्त्राणामेष एव विनिश्चयः।।32।।

शिवलिङ्ग की आराधना करने के समान चारों वेदों में कोई दूसरा पुण्य नहीं है, यह सब शास्त्रों का निश्चय है।।32।।

 सर्वमेतत्यपरित्यज्य कर्मजालमशेषतः।
भक्त्या परमया विद्वाँल्लिङ्गमेकं   प्रपूजयेत्।।33।।

यह.सब कर्मजाल छोड़कर विद्वान पुरुष परम भक्ति से एक ही शिवलिङ्ग का आराधन करे।।33।।

लिङ्गेऽर्चितेऽर्चितं सर्वं जगत्स्थावर जङ्गमम्।
संसाराम्बुधिमग्नानां नान्यत्तसाधनम्।।34

शिवलिङ्ग के अर्चन करने से स्थावर जङ्गात्मक सम्पूर्ण जगत पूजित हो जाता है। जो संसार सागर में मगन हुओं को तारने का साधन है।।34।।

अज्ञानतिमिरान्धानां विषयासक्तचेतसाम्।
प्लवोनान्योऽस्ति जगति लिङ्गाराधनमन्तरा।।35।।

अज्ञान तिमिर से अन्धे हुए लोगों को तथा विषयासक्त चित्त वालों के लिये शिवलिङ्ग आराधन के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।।35।।

 हरिब्रह्मादयो देवा मुनयो यक्षराक्षसाः।
गन्धर्वाश्चारणाः सिद्धा दैतेया दानवास्तथा।।36।।

नागाः शेषप्रभृतयो गरुडाद्याः खगास्तथा।
सप्रजापतयश्चान्ये मनवः किन्नरा नराः।।37।।

हरि, ब्रह्मादिक देवता, मुनि, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, चारण,सिद्धि, दैत्य,दानव, नाग, शेष, गरुण पक्षी, प्रजापति, मनु, किन्नर, नर।।36-37।।

पूजयित्वा महाभक्त्या लिङ्गं सर्वार्थसिद्धिदम्।
प्राप्ताः कामानभीष्टांश्च तांस्तान्सर्वान्हृदि स्थितान्।।38।।

महाभक्ति से सर्वार्थ साधक शिवलिङ्ग का पूजन करके अपने हृदय में स्थित कामनाओं को प्राप्त होते हैं।।38।।

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा प्रतिलोमजः।
पूजयेत्सततं लिङ्गं तत्तन्मन्त्रेण सादरम्।।39।।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा दूसरी जाति उस उस मन्त्र से आदरपूर्वक शिवलिङ्ग का पूजन करते हैं।।39।।

 किं बहूक्तेन मुनयः स्त्रीणामपि तथान्यतः।
अधिकारोऽस्ति सर्वेषां शिवलिङ्गार्चने द्विजाः।।40।।

हे मुनियो! बहुत कहने से क्या है?स्त्री तथा अन्य जाति हो, शिवजी के पूजन का सबको अधिकार है।।40।।

द्विजानां वैदिकेनापि मार्गेणाराधनं वरम्।
अन्येषामपि जन्तूनां वैदिकेन न सम्मतम्।।41।।

ब्राह्मणों को वैदिक मार्ग से पूजन करना श्रेष्ठ है, दूसरे प्राणियों को वेद से पूजन का अधिकार नहीं है।।41।।

वैदिकानां द्विजानां च पूजा वैदिक मार्गतः।
कर्तव्या नान्यमार्गेण इत्याह भगवान  शिवः।।42।।

वैदिक ब्राह्मणों के लिये वेदिकमार्ग से पूजा कही है, उनको अन्य मार्ग से पूजा नहीं करनी चाहिये। यह भगवान शिवजी ने कहा है।।42।।

दधीचि गौतमादीनां शापेनादग्धचेतसाम्।
द्विजानां जायते श्रद्धा नैव वैदिककर्मणि।।43।।

दधीचि, गौतम आदि ब्राह्मणों के शाप से दग्धचित्त वालों की वैदिककर्म में श्रद्धा नहीं होती वा शाप से दग्धचित्त दधीचि, गौतमादि के वंशोत्पन्नों की वैदिककर्म में श्रद्धा नहीं होती।।43।।

 यो वैदिक मनादृत्य कर्म स्मार्तमथापि वा।
अन्यत्समाचरेन्मर्त्यो न संकल्प फलं लभेत।।44।।

जो कोई वेद और स्मृति के कर्म को अनादर करके दूसरा कर्म करता है, उसे उस कर्म का फल नहीं मिलता है।।44।।

इत्थं कृत्वार्चनं शम्भोर्नैवेद्यान्तं विधानतः।
पूजयेदष्टमूर्तीश्च तत्रैव त्रिजगन्मयीः।।45।।

इस प्रकार शिवजी का विधिपूर्वक नैवेद्य पर्यन्त अर्चन करके त्रिजगन्मयी आठ मूर्तियों का पूजन करे।।45।।

क्षितिरापोऽनलो वायुराकाशः सूर्यसोमकौ।
यजमान इति त्वष्टौ मूर्तयः परिकीर्तिताः।।46।।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य, और यजमान, ये आठ मूर्तियां पूज्यमान हैं।।46।।

शर्वो भवश्च रुद्रश्च उग्रो भीम इतीश्वरः।
महादेवः पशुपतिरेतान्मूर्तिभिरर्चयेत्।।47।।

शर्व, भव, रुद्र, उग्र,भीम, ईश्वर, महादेव, पशुपति इनका मूर्ति द्वारा अर्चन करे।।47।।

 पूजयेत्परिवारं च ततः शम्भोः   शुभक्तितः।
ईशानादिक्रमात्तत्र चन्दनाक्षतपत्रकैः।।48।।

विद्वान पुरुष भक्तिभाव से शिवजी के परिवार की पूजा करे। ईशानादि के क्रम से चंदन, अक्षत, पत्र चढ़ावे।।48।।

ईशानं नन्दिनं चण्डं महाकालं च भृङ्गिणम्।
वृषं स्कंदं कपर्दीशं सोमं शुक्रं च तत्क्रमात्।।49।।

ईशान, नन्दी, चण्ड, महाकाल, भृङ्गि, वृष, स्कंद, कपर्दी, सोम, शुक्र इनको क्रम से पूजे।।49।।

अग्रतो वीरभद्रं च पृष्ठे कीर्त्तिमुखं तथा।
तत एकादशान् रुद्रान्पूजयेद्विधिना ततः।।50।।

फिर वीरभद्र का पूजन करे, पीठ की ओर कीर्तिमुख का पूजन करके फिर ग्यारह रुद्रों का विधिपूर्वक पूजन करें।।50।।

ततः पञ्चाक्षरं जप्त्वा शतरुद्रियमेव च।
स्तुतीर्नानाविधाः कृत्वा पञ्चाङ्ग पठनं तथा।।51।।

फिर पञ्चाक्षर मन्त्र का जप करके, शतरुद्रिय पाठ करके, अनेक प्रकार की स्तुति करके पञ्चाङ्ग पाठ करें।।51।।

 ततः प्रदक्षिणां कृत्वा नत्वा लिङ्गं विसर्जयेत्।
इति प्रोक्तमशेषं च शिवपूजनमादरात्।।52।।

फिर प्रदिक्षणा करके शिवलिङ्ग को प्रणाम कर विसर्जन करें। यह आदर सहित शिवजी का सम्पूर्ण पूजन कथन हुआ।।52।।

रात्रावुदङ्मुखः कुर्याद् देवकार्यं सदैव हि।
शिवार्चनं सदाप्येवं शुचिः कुर्यादुदङ्मुखः।।53।।

यह कर्म रात्रि में सदैव उत्तर की ओर मुख करके करना चाहिए। इसी प्रकार उत्तर की ओर मुख करके सदाशिव का पूजन करे।।53।।

न प्राचीमग्रतः शम्भोर्नोदीचीं  शक्तिसंहिताम्।।
न प्रतीचीं यतः पृष्ठमतो ग्राह्यं समाश्रयेत्।।54।।

 जहाँ शिवलिङ्ग स्थापित हो, उससे पूर्व दिशा का आश्रय लेकर नहीं बैठना या खड़ा होना चाहिये, क्योंकि वह दिशा भगवान शिवजी के आगे  या सामने पड़ती है। (इष्टदेव का सामना रोकना ठीक नहीं) शिवलिङ्ग से उत्तर दिशा में भी न बैठें, क्योंकि वह भगवान शिव का वामांग है, जिसमें शक्तिरूपा देवी उमा विराजमान हैं। पूजक को शिवलिङ्ग से पश्चिम दिशा में भी नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि वह आराध्यदेव का पृष्ठभाग है (पीछे की ओर से पूजा करना उचित नहीं है) अतः अवशिष्ट दक्षिण दिशा ही ग्राह्य है। तात्पर्य यह है कि शिवलिङ्ग से दक्षिण दिशा में  उत्तराभिमुख होकर बैठे और पूजा करे।।54।।

विना भस्म त्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया।
बिल्वपत्रं विना नैव पूजयेच्छंकरं बुधः।।55।।

विद्वान पुरूष को चाहिये कि वह भस्म का त्रिपुण्ड्र लगाकर, रूद्राक्ष की माला लेकर तथा बिल्वपत्र का संग्रह करके ही भगवान शंकर की पूजा करे, इनके बिना नहीं।।55।।

भस्माप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठाः प्रवृत्ते शिवपूजने।
तस्मान्मृदापि कर्तव्यं ललाटे च त्रिपुण्ड्रकम्।।56।।

मुनिवरो! शिवपूजन आरम्भ करते समय यदि भस्म न मिले तो मिट्टी से भी ललाट में त्रिपुण्ड्र अवश्य कर लेना चाहिये।।56।।

इति श्री शिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वर संहितायां साध्यसाधन खण्डे पार्थिवपूजनवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः।।21।।

🙏🏿जय बाबा की।🙏🏿
बाबाचरण दास

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ विंशोऽध्यायः

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथ विंशोऽध्यायः

अथ वैदिक भक्तानां पार्थिवार्चा निगद्यते।
वैदिकेनैव मार्गेण भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।।1।।

सूतजी कहते हैं-

महर्षियो!अब मैं वैदिक कर्म के प्रति श्रद्धा भक्ति रखने वाले लोगों के लिये वेदोक्त मार्ग से ही पार्थिव पूजा की पद्धति का वर्णन करता हूँ। यह पूजा भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली है।।1।।

सूत्रोक्तविधिना स्नात्वा सन्ध्यां कृत्वा यथाविधि।
ब्रह्मयज्ञं विधायादौ ततस्तर्पणमाचरेत्।।2।।

आह्निक सूत्रों में बतायी हुई विधि के अनुसार विधिपूर्वक स्नान और संध्योपासना करके पहले ब्रह्मयज्ञ करे। तत्पश्चात देवताओं, ऋषियों, सनकादि मनुष्यों और पितरों का तर्पण करे।।2।।

नैत्यिकं सकलं कामं विधायानन्तरं पुमान्।
शिवस्मरणपूर्वं हि भस्मरुद्राक्षधारकः।।3।।
वेदोक्तविधिना सम्यक सम्पूर्ण फल सिद्धये।
पूजयेत्परया भक्त्या पार्थिवं लिङ्ग मुत्तमम्।।4।।

अपनी रुचि अनुसार सम्पूर्ण नित्यकर्म को पूर्ण करके शिवस्मरण पूर्वक भस्म तथा रुद्राक्ष धारण करे। तत्पश्चात सम्पूर्ण मनोवांक्षित फल की सिद्धि के लिये ऊंची भक्ति भावना के साथ उत्तम पार्थिव लिङ्ग की वेदोक्त विधि से भली भांति पूजा करे।।3-4।।

नदीतीरे तडागे च पर्वते काननेऽपि च।
शिवालये शुचौ देशे पार्थिवार्चा विधीयते।।5

नदी या तालाब के किनारे, पर्वत पर, वन में, शिवालय में अथवा और किसी पवित्र स्थान में पार्थिव पूजा करने का विधान है।।5।।

शुद्ध प्रदेश सम्भूतां मृदमाहृत्य यत्नतः।
शिवलिङ्गं प्रकल्पेत सावधानतया द्विजाः।।6।।

ब्राह्मणों! शुद्ध स्थान से निकाली हुई मिट्टी को यत्नपूर्वक लाकर बड़ी सावधानी के साथ शिवलिङ्ग का निर्माण करे।।6।।

विप्रे गौरा स्मृता शोणा बाहुजे पीतवर्णका।
वैश्ये कृष्णा पादजाते ह्यथवा यत्र या भवेत्।।7।।

ब्राह्मण के लिये श्वेत, क्षत्रिय के लिये लाल, वैश्य के लिये पीली, और शूद्र के लिये काली मिट्टी से शिवलिङ्ग बनाने का विधान है अथवा जहाँ जो मिट्टी मिल जाये, उसी से शिवलिङ्ग बनाये।।7।।

सङ्गृह्य मृत्तिकां लिङ्ग निर्माणार्थं प्रयत्नतः।
अतीव शुभदेशे च स्थापयेत्तां मृदं शुभाम्।।8।।

शिवलिङ्ग बनाने के लिये प्रयत्न पूर्वक मिट्टी का संग्रह करके उस शुभ मृत्तिका को अत्यंत शुद्ध स्थान में रखे।।8।।

संशोध्य च जलेनापि पिण्डीकृत्य शनैःशनैः।
विधीयेत शुभं लिङ्गं पार्थिवं वेदमार्गतः।।9।।

फिर मिट्टी की शुद्धि करके जल से सानकर पिण्डी बना ले और वेदोक्त मार्ग से धीरे धीरे सुन्दर पार्थिवलिङ्ग की रचना करे।।9।।

ततः सम्पूजयेद्भक्त्या भुक्तिमुक्ति फलाप्तये।
तत्प्रकारमहं वच्मि श्रृणुध्वं सविधानतः।।10।।

तत्पश्चात भोग और मोक्ष रुपी फल की प्राप्ति के लिये भक्ति पूर्वक उसका पूजन करे। उस पार्थिवलिङ्ग के पूजन की जो विधि है, उसे मैं विधानपूर्वक बता रहा हूँ, तुम सब लोग सुनो।।10।।

नमःशिवाय मन्त्रेणार्चन द्रव्यं च प्रोक्षयेत्।
भूरसीति च मन्त्रेण क्षेत्रसिद्धिं प्रकारयेत्।।11।।

'ॐ नमः शिवाय' इस मंन्त्र का उच्चारण करते हुए समस्त पूजन सामग्री का प्रोक्षण करे, उस पर जल छिड़के। इसके बाद "भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ गूँ ह पृथिवीं मा हि गूँ सीः" मंन्त्र से क्षेत्र सिद्धि करे।।11।।

आपोऽस्मानिति मन्त्रेण जल संस्कार माचरेत।
नमस्ते रुद्र मन्त्रेण स्फाटिकाबन्ध मुच्यते।।12।।

फिर "आपो अस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु। विश्व गूँ हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरि पूत एमि। दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा गूँ शग्मां परि दधे भद्रं वर्णं पुख्यन्।" इस मंन्त्र से जल का संस्कार करे। इसके बाद "नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नमः बाहुभ्यामुत ते नमः" इस मंन्त्र से स्फाटिकाबन्ध (स्फटिक शिला का घेरा) बनाने की बात कही गयी है।।12।।

शम्भवायेति मन्त्रेण क्षेत्रशुद्धिं प्रकारयेत्।
कुर्यात्पञ्चामृतस्यापि नमः पूर्वेण प्रोक्षणम्।।13।।

नीलग्रीवाय मन्त्रेण नमः पूर्वेण भक्तिमान्।
चरेच्छङ्कर लिङ्गस्य प्रतिष्ठापन मुत्तमम्।।14।।

नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च। इस मंन्त्र से क्षेत्र शुद्धि और पंचामृत का प्रोक्षण करे। तत्पश्चात शिवभक्त पुरुष 'नमः' पूर्वक "नमोस्तु नीलग्रीवाय सहस्त्राक्षाय मीढुखे। अथो जे अस्य सत्वानोऽहंतेभ्योऽकरं नमः" मन्त्र से  शिवलिङ्ग की उत्तम प्रतिष्ठा करे।।13-14।।

भक्तितस्तत एतत्ते रुद्रायेति च मन्त्रतः।
आसन रमणीयं वै दद्याद्वैदिक मार्गकृत्।।15।।

इसके बाद वैदिक रीति से पूजन कर्म करने वाला उपासक भक्तिपूर्वक "एतत्ते रुद्रावसंतेन परो मूजवतोऽतीहि। अवततधन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा अहि गूँ सन्नः शिवोतीहि।" इस मन्त्र से रमणीय आसन दे।।15।।

मानोमहान्तमिति च मन्त्रेणावाहनं चरेत्।
या ते रुद्रेण मन्त्रेण सन्चरेदुपवेशनम्।।16।।

"मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्। मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः"।। इस मन्त्र से आवाहन करे। "या ते रुद्र शिवि तनूर घोराऽपापकाशिनी। या नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि।" इस मंन्त्र से भगवान शिव को आसन पर समासीन करे।।16।।

मन्त्रेण यामिषुमिति न्यासं कुर्याच्छिवस्य च।
अध्यवोचदिति प्रेम्णाधिवासं मनुनाचरेत्।।17।।

"यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु माहि गूँ सीः पुरुषं जगत्।" इस मन्त्र से शिव के अङ्गों में न्यास करे।"अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्। अहीँश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यो ऽधराचीः परा सुव।" इस मन्त्र से प्रेमपूर्वक अधिवासन करे।।17।।

मनुनासौ जीव इति देवतान्यासमाचरेत्।
असौ योऽवसर्पतीति चाचरेदुपसर्पणम्।।18।।

"असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः। ये चैन गूँ रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्त्रशोऽवैखा गूँ हेड ईमहे।" इस मंन्त्र से शिवलिङ्ग में इष्टदेवता भगवान शिव का न्यास करे। "असौऽयो वसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः। उतैनं गोपा अदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः।" इस मंन्त्र से उपसर्पण (देवता के समीप गमन) करे।।18।।

नमोस्तु नीलग्रीवायेति पाद्यं मनुनाहरेत्।
अर्घ्यं च रुद्रगायत्र्याचमनं त्र्यम्बकेण च।।19।।

इसके बाद "नमोस्तु नीलग्रीवाय सहस्त्राक्षाय मीढुखे। अथो जे अस्य सत्वानोऽहंतेभ्योऽकरं नमः" इस मंन्त्र से इष्टदेव को पाद्य समर्पित करे।"तत्पुरुखाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" मन्त्र से अर्घ्य दे।।19।।

पयः पृथिव्यां मन्त्रेण पयसा स्नानमाचरेत्।
दधिक्राव्णेति मन्त्रेण दधिस्नानं च कारयेत्।।20।।

"पय पृथिव्यां पय ओखधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः।पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम" इस मन्त्र से दुग्ध स्नान कराये। "दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखा करत्प्रणआयू गूँ षि तारिषत्" इस मन्त्र से दधिस्नान कराये।।20।।

घृतस्नानं खलु घृतं घृतयावेति मन्त्रतः।
मधुव्वाता मधुनक्तं मधुमान्न इति त्र्यृचा।।21।।

शिवभक्त पुरुष "घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा। दिशः प्रदिश आदिशो विदिश उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा।" इस मन्त्र से घृत स्नान कराये। "मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव गूँ रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता।मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमा गूँ अस्तु सूर्य्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः।" इन तीन ऋचाओं से मधुस्नान और शर्करा स्नान कराये।।21।।

मधुखण्डस्नपनं प्रोक्तमिति पञ्चामृतं स्मृतम्।
अथवा पाद्य मन्त्रेण स्नानं पञ्चामृतेन च।।22।।

इन दुग्ध, दधि,घृत, मधु, शर्करा आदि पाँच वस्तुओं को पञ्चामृत कहते हैं। अथवा पाद्य समर्पण के लिये कहे गये "नमोस्तु नीलग्रीवाय....।" इत्यादि मन्त्र द्वारा पञ्चामृत स्नान कराये।।22।।

मानस्तोके इति प्रेम्णा मन्त्रेण कटिबन्दनम्।
नमो धृष्णवे इति वा उतरीयं च धारयेत्।।23।।

तदनन्तर "मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। मा नो वीरान् रुद्रभामिनो वधीर्हविषमन्तः सदमित् त्वा हवामहे।" इस मंन्त्र से भगवान शिव को कटिबंध(करधनी) अर्पित करे। "नमोधृष्णवे च प्रमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेषुधिमते च नमस्तीक्षणेषवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने च।"इस मंन्त्र का उच्चारण करके आराध्य देवता को उत्तरीय धारण कराये।।23।।

 या ते हेतिरिति प्रेम्णा ऋक्चतुष्केण वैदिकः।
शिवाय विधिना भक्तश्चरेद्वस्त्र समर्पणम्।।24।।

शिवभक्त पुरूष "या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः। तयास्मान्विश्वतस्त्वम यक्ष्मया परिभुज।। परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः। अथो ज इखुधिस्तवारे अस्मन्नि धेहि तम्।। अवतत्य धनुष्ट्व गूँ सहस्त्राक्ष शतेषुधे। निशीर्य्य शल्यानां मुखा शिवो न सुमना भव।। नमस्त आयुधायानातताय धृष्णवे। उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने।।" इत्यादि चार ऋचाओं को पढ़कर प्रेम से विधिपूर्वक भगवान शिव के लिये वस्त्र एवं यज्ञोपवीत समर्पित करे।।24।।

नमः श्वभ्य इति प्रेम्णा गन्धं दद्यादृचा सुधीः।
नमस्तक्षभ्य इति चाक्षतान्मन्त्रेण चार्पयेत्।।25।।

इसके बाद "नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च।।" इत्यादि मन्त्र को पढ़कर शुद्ध बुद्धि वाला भक्त पुरूष भगवान शिव के लिये प्रेमपूर्वक गन्ध, सुगन्धित चन्दन एवं रोली चढायें। "नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः कुलालेभ्यः कर्मारेभ्यश्च वो नमो नमो निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमो नमः श्वनिभ्यो मृगयुभ्यश्च वो नमः"।। इस मन्त्र से अक्षत अर्पित करे।।25।।

नमः पार्याय इति वा पुष्पं मन्त्रेण चार्पयेत्।
नमः पर्ण्णाय इति वा बिल्वपत्र समर्पणम्।।26।।

नमः पार्याय चावार्याय च नमः प्रतरणाय चोत्तरणाय च नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्याय च।" इस मन्त्र से फूल चढ़ाये। "नमः पर्णाय च पर्णशदाय च नम उद्गुरमाणाय चाभिघ्नते च नम आखिदते च प्रखिदते च नम इखुकृद्भ्यो धनुष्कृद्भ्यश्च वो नमो नमो वः किरिकेभ्यो देवाना गूँ हृदयेभ्यो नमो विचिन्वत्केभ्यो नमो नम आनिर्हतेभ्यः।" इस मन्त्र से विल्वपत्र समर्पण करे।।26।।

 नमः कपर्दिने चेति धूपं दद्याद्यथाविधि।
दीपं दद्याद्यथोक्तं तुनम आशव इत्यृचा।।27।।

 नमो ज्येष्ठाय मन्त्रेण दद्यान्नैवेद्य मुत्तमम्।
मनुना त्रयम्बकमिति पुनराचमनं स्मृतम्।।28।।

शिवभक्त पुरुष "नमः कपर्दिने च व्युप्तकेशायच नमः सहस्त्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मीढुष्टमाय चेषुमते च।।" इत्यादि मन्त्र से विधिपूर्वक धूप दे। " नम आशवे चाजिराय च नमः  शीघ्र्याय च शीम्याय च नम ऊर्म्याय चावस्वन्याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च।।" इस ऋचा से शास्त्रोक्त विधि के अनुसार दीप निवेदन करे। तत्पश्चात हाथ धोकर "नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय चापरजाय च नमो मध्यमाय चापगल्भाय च नमो जघन्याय च बुधन्याय च।।" इस मन्त्र से उत्तम नैवेद्य अर्पित करे। फिर पूर्वोक्त त्रयम्बक मन्त्र से आचमन कराये।।27-28।।

इमा रुद्रायेति ऋचा कुर्यात्फल समर्पणम्।
नमो व्रज्यायेति ऋचा सकलं शम्भवेऽर्पयेत्।।29।।

"इमारुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्रभरामहे मतीः। यथा शमशद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टंग्रामे अस्मिन्ननातुरम्।।" इस ऋचा से फल समर्पण करे। फिर "नमोव्रज्याय च गोष्ठयाय च नमस्तल्प्यायच गेह्याय च.नमो.हृदय्याय च निवेष्याय च नमः काट्याय च गह्वरेष्ठाय च।।" इस मंन्त्र से भगवान शिव को अपना सब कुछ समर्पित कर दे।।29।।

मानो महान्तमिति च मानस्तोके इति ततः।
मन्त्रद्वयेनैकादशाक्षतै रुद्रान्प्रपूजयेत।।30।।

तदनन्तर "मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्। मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः"।। तथा "मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। मा नो वीरान् रुद्रभामिनो वधीर्हविषमन्तः सदमित्त्वा हवामहे।" इन दो मन्त्रों द्वारा केवल अक्षतों से ग्यारह रूद्रों का पूजन करे।।30।।

हिरण्यगर्भ इति त्र्यृचा दक्षिणां हि समर्पयेत्।
देवस्यत्वेति मन्त्रेण ह्यभिषेकं चरेद्बुधः।।31।।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।इत्यादि मन्त्र से जो तीन ऋचाओं के रूप में पठित है, दक्षिणा चढ़ायें। "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्वि नोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्।" अश्विनोर्भैषज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभि षिञ्चामि सरस्वत्यै भैषज्येन वीर्यायाआद्यायाभि षिञ्चामीन्द्रस्येन्द्रियेण बलाय श्रियै यशसेऽभिषिञ्चामि।" इस मंन्त्र से विद्वान पुरुष आराध्य देव का अभिषेक करे।।31।।

दीपमन्त्रेण वा शम्भोर्नीराजनविधिं चरेत्।
पुष्पांजलिं चरेद्भक्त्या इमा रुद्राय च त्र्यृचा।।32।।

दीप के लिये बताये हुये " नम आशवे चाजिराय च नमः  शीघ्र्याय च शीम्याय च नम ऊर्म्याय चावस्वन्याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च।।" इत्यादि मंन्त्र से भगवान शिव की नीराजना (आरती) करे। तत्पश्चात "इमारुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्रभरामहे मतीः। यथा शमशद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टंग्रामे अस्मिन्ननातुरम्।।" इत्यादि तीन ऋचाओं से भक्तिपूर्वक रुद्रदेव को पुष्पाञ्जलि अर्पित करे।।32।।

मानोमहान्तमिति च चरेत्प्राज्ञः प्रदक्षिणाम्।
मानस्तोकेति मन्त्रेण साष्टाङ्गं प्रणमेत्सुधीः।।33।।

विज्ञ उपासक "मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्। मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः"।। इस मन्त्र से पूजनीय देवता की परिक्रमा करे। फिर उत्तम बुद्धि वाला उपासक "मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। मा नो वीरान् रुद्रभामिनो वधीर्हविषमन्तः सदमित्त्वा हवामहे।" इस मन्त्र से भगवान को साष्टांग प्रणाम करे।।33।।

एष ते इति मन्त्रेण शिवमुद्रां प्रदर्शयेत्।
यतो यत इत्यभयां ज्ञानाख्यां त्र्यम्बकेण च।।34।।

"एष ते रुद्र भागः सह स्वस्त्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहा। एष ते रुद्र भाग आखुस्ते पशुः।।" इस मंन्त्र से शिवमुद्रा का प्रदर्शन करे। "यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं न पशुभ्यः।।" इस मंन्त्र से अभय नामक मुद्रा का तथा "त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। "त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्। उर्वारुकमिव बन्धनादितोमुक्षीय  मामुतः।।" मंन्त्र से ज्ञान नामक मुद्रा का प्रदर्शन करे।।34।।

नमः सेनेति मन्त्रेण महामुद्रां प्रदर्शयेत्।
दर्शयेद्धेनुमुद्रां च नमो गोभ्य ऋचानया।।35।।

नमः सेनाभ्यः सेनानिभ्यश्च वो नमो नमो रथिभ्यो अरथेभ्यश्च वो नमो नमः। क्षतृभ्यः संग्रहीतृभ्यश्च वो नमो नमो महद्भ्यो अर्भकेभ्यश्च वो नमः।। इस मंन्त्र से महामुद्रा का प्रदर्शन करे। "नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एव च। नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमो नमः।।" इस ऋचा द्वारा धेनुमुद्रा दिखाये।।35।।

पञ्च मुद्राः प्रदश्यार्थ शिवमन्त्र जपं चरेत्।
शतरुद्रिय मन्त्रेण जपेद् वेदविचक्षणः।।36।।

इस तरह पांच मुद्राओं का प्रदर्शन करके शिव सम्बन्धी मन्त्रों का जप करे अथवा वेदज्ञ पुरुष 'शतरुद्रिय' मंन्त्र (रुद्री का पाँचवा अध्याय ) की आवृत्ति करे।।36।।

ततः पञ्चाङ्गपाठं च कुयाद् वेदविचक्षणः।
देवागात्विति मन्त्रेण कुर्याच्छम्भोर्विसर्जनम्।।37।।

तत्पश्चात वेदज्ञ पुरुष पञ्चाङ्ग पाठ करे। तदनन्तर" देवा गातविदो गातुं वित्त्वा गातमित। मनसस्पत इमं देव यज्ञ गूँ स्वाहा वाते धाः।।" इत्यादि मंन्त्र से शिवलिङ्ग का विसर्जन करे।।37।।

इत्युक्तः शिवपूजाया व्यासतो वैदिको विधिः।
समासतश्च श्रृणुत वैदिकं विधिमुत्तमम्।।38।।

इस प्रकार शिव पूजा की वैदिक विधि का विस्तार से प्रतिपादन किया। महर्षियो!अब संक्षेप से भी पार्थिव पूजन की वैदिक विधि का वर्णन सुनो।।38।।

ऋचा सद्योजातमिति मृदाहरणमाचरेत्।
वामदेवाय इति च जलप्रक्षेपमाचरेत्।।39।।

"सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय नमः।।" इस ऋचा से पार्थिव शिवलिङ्ग बनाने के लिये मिट्टी ले आये। "ऊँ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मथाय नमः।।" इत्यादि मंन्त्र पढ़कर मिट्टी में जल डालें।।39।।

अघोरेण च मन्त्रेण लिङ्गनिर्माणमाचरेत्।
तत्पुरुखाय मन्त्रेणाह्वानं कुर्याद्यथाविधि।।40।।

जब मिट्टी सनकर तैयार हो जाय तब "ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तुऽरूद्र रुपेभ्यः।" मंन्त्र पढ़ते हुए शिवलिङ्ग निर्माण करे। फिर "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।" इस मंन्त्र से विधिवत उसमें भगवान शिव का आवाहन करे।।40।।

संयोजयेद्वेदिकायामीशानमनुना हरम्।
अन्यत्सर्वं विधानं च कुर्यात्संक्षेपतः सुधीः।।41।।

"ऊँ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो धिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तुऽसदा शिवोम्।" मंन्त्र से भगवान शिव को वेदी पर स्थापित करे। इनके सिवाय अन्य सब विधानों को भी शुद्ध बुद्धि वाला उपासक संक्षेप से ही सम्पन्न करे।।41।।

पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण गुरुदत्तेन वा तथा।
कुर्यात्पूजां षोडशोपचारेण विधिवत्सुधीः।।42।।

इसके बाद विद्वान पुरुष पञ्चाक्षर मंन्त्र से अथवा गुरु के दिये हुये अन्य किसी भगवान शिव सम्बन्धी मंन्त्र से सोलह उपचारों द्वारा विधिवत पूजन करे।।42।।

भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमहि।
उग्राय उग्रनाशाय शर्वाय शशिमौलिने।।43।।

अनेन मनुना वापि पूजयेच्छङ़्करं सुधीः।
सुभक्त्या च भ्रमं त्यक्त्वा भक्त्यैव फलदः शिवः।।44।।

इस मंन्त्र द्वारा विद्वान उपासक भगवान शिव की पूजा करे। वह भ्रम छोड़कर उत्तम भक्ति भाव से भगवान शिव की आराधना करे, क्योंकि भगवान शिव भक्ति से ही मनोवांक्षित फल देते हैं।।43-44।।

इत्यपि प्रोक्तमादृत्य वैदिकं क्रमपूजनम्।
प्रोच्यतेऽन्यवविधिः सम्यक्साधारणतया द्विजाः।।45।।

ब्राह्मणो!यहाँ जो वैदिक विधि से पूजन का क्रम बताया गया है, इसका पूर्ण रूप से आदर करता हुआ मैं पूजा की एक दूसरी विधि भी बता रहा हूँ, जो उत्तम होने के साथ ही सर्व साधारण के लिये उपयोगी है।।45।।

पूजा पार्थिवलिङ्गस्य संप्रोक्ता शिवनामभिः।
तां श्रृणुध्वं मुनिश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदायिनीम्।।46।।

हरो महेश्वरः शम्भुः शूलपाणिः पिनाकधृक।
शिवः पशुपतिभ्यश्च महादेव इति क्रमात्।।47।।

मुनिवरो! पार्थिवलिङ्ग की पूजा भगवान शिव के नामों से बतायी गयी है। वह पूजा सम्पूर्ण अभीष्टों को देने वाली है। मैं उसे बताता हूँ, सुनो! हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधृक, शिव, पशुपति और महादेव- ये क्रमशः शिव के आठ नाम कहे गये हैं।।46-47।।

मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव च।
स्नपनं पूजनं चैव त्रमस्वेति विसर्जनम्।।48।।

इनमें से प्रथम नाम द्वारा अर्थात'ॐ हराय नमः' का उच्चारण करके पार्थिवलिङ्ग बनाने के लिये मिट्टी ले आये। दूसरे नाम अर्थात 'ॐ महेश्वराय नमः' का उच्चारण करके उस पार्थिवलिङ्ग की प्रतिष्ठा करे। तत्पश्चात 'ॐ शूलपाणये नमः' कहकर उस पार्थिवलिङ्ग में भगवान् शिव का आवाहन करे। 'ॐ पिनाकधृषे नमः' कहकर उस पार्थिवलिङ्ग को नहलाये। 'ॐ शिवाय नमः' बोलकर उसकी पूजा करे। फिर 'ॐ पशुपतये नमः' कहकर क्षमा प्रार्थना करे और अंत में 'ॐ महादेवाय नमः:' कहकर आराध्य देव का विसर्जन कर दे।।48।।

ऊँकारादि चतुर्थ्यन्तैर्नमोऽन्तैर्नामभिः क्रमात्।
कर्तव्याश्च क्रियाः सर्वा भक्त्या परमया मुदाः।।49।।

प्रत्येक नाम के आदि में ॐ कार और अंत में चतुर्थी विभक्ति के साथ नमः पद लगाकर बड़े आनन्द और भक्ति भाव से पूजन सम्बन्धी सारे कार्य करने चाहिये।।49।।

कृत्वा न्यासविधिं सम्यक् षडङ्गं करयोस्तथा।
षडक्षरेण मन्त्रेण ततो ध्यानं समाचरेत्।।50।।

षडक्षर मंन्त्र से अङ्गन्यास और करन्यास की विधि भली भांति सम्पन्न करके फिर नीचे लिखे अनुसार ध्यान करे।।50।।

भक्तैः सनन्दादिभिरर्च्यमानम्।
भक्तार्तिदावानलमप्रमेयं ध्यायेदुमालिङ्गितविश्वभूषणम्।।51।।

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशु मृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानम् विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।52।।

जो कैलास पर्वत पर एक सुन्दर सिंहासन के मध्यभाग में विराजमान हैं, जिनके वामभाग में भगवती उमा उनसे सटकर बैठी हैं। सनक सनंदन आदि भक्तजन जिनकी पूजा कर रहे हैं तथा जो भक्तों के दुःख रुपी दावानल को नष्ट कर देने वाले अप्रमेय शक्तिशाली ईश्वर हैं, उन विश्वभूषण भगवान् शिव का चिंतन करना चाहिये। भगवान महेश्वर का प्रतिदिन इस प्रकार ध्यान करें। उनकी अङ्गकांति चाँदी के पर्वत की भाँति गौर है। वे अपने मस्तक पर मनोहर चंद्रमा का मुकुट धारण करते हैं। रत्नों के आभूषण धारण करने से उनका श्रीअङ्ग और भी उद्भासित हो उठा है। उनके चार हाथों में क्रमशः परशु, मृगमुद्रा, वर एवं अभय मुद्रा सुशोभित हैं। वे सदा प्रसन्न रहते हैं। कमल के आसन पर बैठे हैं और देवतालोग चारों ओर खड़े होकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। उन्होंने वस्त्र की जगह व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है। वे इस विश्व के आदि हैं, बीज (कारण) रूप हैं। तथा सबका समस्त भय हर लेने वाले हैं। उनके पांच मुख हैं और प्रत्येक मुखमंडल में तीन तीन नेत्र हैं।।51-52।।

 इति ध्यात्वा च सम्पूज्य पार्थिवं लिङ्गमुत्तमम्।
जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं गुरुदत्तं यथाविधि।।53।।

इस प्रकार ध्यान तथा उत्तम पार्थिवलिङ्ग का पूजन करके गुरु के दिये हुए पञ्चाक्षर मंन्त्र का विधिपूर्वक जप करे।।53।।
स्तुतिभिश्चैव देवेशं स्तुवीत प्रणमन्सुधीः।
नानाभिधाभिर्विप्रेन्द्राः पठेद् वै शतरुद्रियम्।।54।।

विप्रवरो! विद्वान पुरुष को चाहिये कि वह देवेश्वर शिव को प्रणाम करके नाना प्रकार की स्तुतियों द्वारा उनका स्तवन करे तथा शतरुद्रिय का पाठ करे।।54।।

ततः साक्षतपुष्पाणि गृहीत्वाञ्जलिना मुदा।
प्रार्थयेच्छङ्करं भक्त्या मन्त्रैरेभिः सुभक्तितः।।55।।

तत्पश्चात अञ्जलि में अक्षत और फूल लेकर उत्तम भक्तिभाव से निम्नांकित मन्त्रों को पढ़ते हुए प्रेम और प्रसन्नता के साथ भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करे।।55।।

तावकस्त्वद्गुण प्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा भूतनाथ प्रसीद मे।।56।।

सबको सुख देने वाले कृपानिधान भूतनाथ शिव! मैं आपका हूँ। आपके गुण ही मेरे प्राण, मेरे जीवन सर्वश्व हैं। मेरा चित्त सदा आपके ही चिंतन में लगा हुआ है। यह जानकर मुझ पर प्रसन्न होइए।।56।।

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतघ्न तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर।।57।।

कृपा कीजिए।शंकर! मैंने अनजान में अथवा जानबूझकर यदि कभी आपका जप और पूजन आदि किया हो तो आपकी कृपा से वह सफल हो जाय।।57।।

अहं पापी महानद्य पावनश्च भवान्महान्।
इति विज्ञाय गौरीश यदिच्छसि  तथा कुरू।।।58।।

गौरीनाथ! में आधुनिक युग का महान पापी हूं, पतित हूँ। और आप सदा से ही परम महान पतित पावन हैं इस बात का विचार करके आप जैसा चाहे वैसा करें।।58।।

वेदै‌: पुराणै: सिद्धान्तैर्ऋषिभिर्विविधैरपि।
न ज्ञातोऽसि महादेव कुतोऽहं त्वां सदाशिव।।59।।

 महादेव! सदाशिव! वेदों पुराणों नाना प्रकार के शास्त्रीय सिद्धांतों और विभिन्न महर्षियों ने भी अब तक आप को पूर्ण रूप से नहीं जाना है फिर मैं कैसे जान सकता हूँ।।59।।

यथातथात्वदीयोस्मि सर्वभावैर्महेश्वर।
रक्षणीस्त्वयाहं वै प्रसीद परमेश्वर।।60।।

जैसा हूँ वैसे सब भाव से मैं तुम्हारा हूँ। हे!परमेश्वर आप हम पर प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिये।।60।।

इत्येवंचाक्षतान्पुष्पाण्यारोप्य च शिवोपरि।
प्रणमेद्भक्तितश्शंभुसाष्टांग विधिवन्मुने।।61।।

इस प्रकार शिवजी के ऊपर पुष्प और अक्षत का आरोपण करके विधि पूर्वक शिवजी को साष्टांग प्रणाम करे।।61।।

ततः प्रदिक्षणां कुर्याद्यथोक्तविधिनासुधीः।
पुनःस्तुवीतदेवेशंस्तुतिभिः श्रद्धयान्वितः।।62।।

फिर विधिपूर्वक प्रदिक्षणा करे। फिर स्तुतियों से श्रद्धा पूर्वक देवेश की स्तुति करे।।62।।

ततो गलरवं कृत्वा प्रणमेच्छुचिनमध्रीः।
कुर्याद्विज्ञप्तिमादृत्य विसर्जनमथाचरेत्।।63।।

इसके बाद गाल बजाकर(गले से अव्यक्त शब्द का उच्चारण करके) पवित्र एवं विनीत चित्तवाला साधक भगवान को प्रणाम करे। फिर आदरपूर्वक विज्ञप्ति करे और उसके बाद विसर्जन।।63।।

इत्युक्ता मुनिशार्दूलाः पार्थिवार्चा विधानतः।
भुक्तिदा मुक्तिदा चैव शिवभक्तिविवर्धिनी।।64।।

मुनिवरो!इस प्रकार विधिपूर्वक पार्थिवपूजा बतायी गयी। वह भोग और मोक्ष देने वाली तथा भगवान शिव के प्रति भक्तिभाव को बढ़ाने वाली है।।64।।

इत्यध्यायं सुचित्तेन यः पठेच्छृणुयादपि।
सर्वपाप विशुद्धात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात्।।65।।

आयुरारोग्यदं चैव यशस्यं स्वर्ग्यमेव च।
पुत्रपौत्रादिसुखदमाख्यानमिद मुत्तमम्।।66।।

जो इस अध्याय को अच्छे मन से प्रसन्नता पूर्वक पढ़ता है, वह सर्व पापों से विशुद्ध होकर सर्व कामनाओं को प्राप्त हो जाता है। यह उत्तम आख्यान आयु, आरोग्य, यश, और स्वर्ग का देने वाला तथा पुत्र पौत्र का सुख देने वाला है।।65-66।।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वर संहितायां साध्यसाधन खण्डे पार्थिव शिवलिङ्ग पूजनविधिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः।।20।।

🙏🏿जय बाबा की।🙏🏿
बाबाचरण दास

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथैकोनविंशोऽध्यायः

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथैकोनविंशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

सूत सूत चिरञ्जीव धन्यस्त्वं शिवभक्तिमान्।
सम्यगुक्तस्त्वया लिङ्ग महिमा. सत्फलप्रदः।।1।।

ऋषि बोले-

हे सूतजी आप चिरकाल तक जियें। आप धन्य हो और शिवजी के भक्त हो। आपने शिवलिङ्ग की महिमा और फल  विषय सम्यक प्रकार से कहा।।1।।

यत्र पार्थिवमाहेश लिङ्गस्य महिमाधुना।
सर्वोत्कृष्टश्च कथितो व्यासतो ब्रूहि तं पुनः।।2।।

पार्थिव महेश्वरजी की महिमा आपने सर्वोत्कृष्ट कही है। वह आपने व्यास जी से सुनी है और वह सुनने की हमारी इच्छा है।।2।।

सूत उवाच

श्रृणुध्वमृषयः सर्वे सदभक्त्यादरतोऽखिलाः।
शिवपार्थिवलिङ्गस्य महिमा प्रोच्यते मया।।3।।

सूतजी बोले- हे समस्त ऋषियो!आप सुनिये, मैं आपकी भक्ति और आदर से प्रसन्न होकर कहता हूँ। मैं आपसे शिवजी के पार्थिव शिवलिङ्ग  की महिमा कहता हूँ।।3।।

उक्तेष्वेतेषू लिङ्गेषु पार्थिवंं लिङ्ग मुत्तमम्।
तस्य पूजनतो विप्रा बहवः सिद्धिमागताः।।4।।

हे ब्राह्मणो!कहे हुए सब लिङ्गों में पार्थिव  शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है, उसका पूजन करके बहुत शिवभक्त सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।।4।। 

हरिर्ब्रह्मा च ऋषयः सप्रजापतयस्तथा।
सम्पूज्य पार्थिवंं लिङ्गंं प्रापुः सर्वेप्सितं द्विजाः।।5।।

हरि,ब्रह्मा,ऋषि, प्रजापति पार्थिव शिवलिङ्ग का पूजन करके सब अपने मनोरथों को प्राप्त हुए हैं।।5।।

देवासुर मनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः।
अन्येऽपि बहवः सिद्धिं तं सम्पूज्य गताः पराम्।।6।।

देवता, असुर, मनुष्य, गंधर्व, उरग, राक्षस और भी बहुत पार्थिवलिङ्ग पूजन करके परम सिद्धि को प्राप्त हुये हैं।।6।।

कृते रत्नमयं लिङ्गं त्रेतायां हेमसम्भवम्।
द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे।।7।।

सतयुग में रत्न का लिङ्ग, त्रेता में सुवर्ण का लिङ्ग, द्वापर में पारे का लिङ्ग और कलयुग में पार्थिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।7।।

अष्टमूर्तिषु सर्वासु मूर्तिर्वै पार्थिवी वरा।
अनन्यपूजिता विप्रास्तपस्तस्मान्महत्फलम्।।8।।

सब आठ मुर्तियों में पार्थिव मूर्ति श्रेष्ठ है। हे ब्राह्मणो!उसका पूजन करने से तप से भी अधिक फल मिलता है।।8।।

यथा सर्वेषु देवेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठः महेश्वरः।
एवं सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठ मुच्यते।।9।।

जैसे सब देवताओं में महेश्वर जी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सभी शिवलिङ्ग में पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।9।।

यथा नदीषु सर्वासु ज्येष्ठा श्रेष्ठा सुरापगा।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठ मुच्यते।।10।।

जैसे सभी नदियों में गंगा श्रेष्ठ है,उसी प्रकार सभी शिवलिङ्ग में पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।10।।

यथा सर्वेषु मन्त्रेषु प्रणवो हि महान्स्मृतः।
तथेदु पार्थिवं श्रेष्ठ माराध्यं पूज्यमेव हि।।11।।

जैसे सब मंत्रों में ॐ कार श्रेष्ठ है, उसी प्रकार  पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ और पूजनीय है।।11।।

यथा सर्वेसछ वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठ उच्यते।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठ मुच्यते।।12।।

जैसे सब वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सब शिवलिङ्गों में पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।12।।

यथा पुरीषु सर्वासु काशी श्रेष्ठतमा स्मृता।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठ मुच्यते।।13।।

जैसे सब पुरियों में काशी श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सब शिवलिङ्गों में पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।13।।

यथा व्रतेषु सर्वेषु शिवरात्रि वृतं परम्।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठ मुच्यते।।14।।

जैसे सब व्रतों में शिवरात्रि व्रत श्रेष्ठ है। उसी प्रकार सब शिवलिङ्गों में पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।14।।

यथा देवीषु सर्वासु शैवी शक्तिः परा स्मृता।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठ मुच्यते।।15।।

जिस प्रकार सब शक्तियों में शैवी पराशक्ति श्रेष्ठ है,  उसी प्रकार सब शिवलिङ्गों में पार्थिव शिवलिङ्ग श्रेष्ठ है।।15।।

प्रकृत्य पार्थिवं लिङ्गं योऽन्यदेवं प्रपूजयेत्।
वृथाभवति सा पूजा स्नानदानादिकं वृथा।।16।।

पार्थिव शिवलिङ्ग करके जो अन्य देवताओं की पूजा करता है, उसकी वह पूजा और स्नानदानादिक वृथा होता है।।16।।

पार्थिवाराधनं पुण्यं धन्यमायुर्विवर्धनम्।
तुष्टिदं पुष्टिदं श्रीदं कार्यं साधकसत्तमैः।।17।।

पार्थिव आराधन पवित्र और पुण्यरूप है, धन तथा आयु को बढ़ाने वाला है। तुष्टि, पुष्टि तथा लक्ष्मी का देने वाला और कार्य को साधन करने वाला है।।17।।

यथालब्धोपचारैश्च भक्तिश्रद्धासमन्वितः।
पूजयेत्पार्थिवं लिङ्गं सर्वकामार्थसिद्धिदम्।।18।।

यः कृत्वा पार्थिवं लिङ्गं पूजयेच्छुभवेदिकम्।
इहैव धनवाञ्छ्रीमानन्ते रुद्रोऽभिजायते।।19।।

जो अच्छे उपचार और भक्ति, श्रद्धा के सहित सब कामनाओं को प्रदान करने वाले पार्थिव शिवलिङ्ग का पूजन करता है और जो पार्थिव शिवलिङ्ग और वेदी का  पूजन करता है, वह धनवान लक्ष्मीवान होकर अन्त में रुद्रलोक  को जाता है।।18-19।।

त्रिसन्ध्यं योऽर्चरेल्लिङ्गं कृत्वा बिल्वेन पार्थिवम्।
दशैकादशकं यावत्तस्य पुण्यफलं श्रृणु।।20।।

अनेनैव स्वदेहेन रुद्रलोके महीयते।
पापहं सर्वमर्त्यानां दर्शनात्स्पर्शनादपि।।21।।

जो बिल्वपत्र से तीनों संध्याओं में दस, ग्यारह या बारह बार पूजन करता है, उसके पुण्य का फल सुनिये। इसी देह से वह रुद्रलोक को प्राप्त होता है, उसके दर्शन और स्पर्श से मनुष्यों के सब पाप जाते रहते हैं।।20-21।।

जीवन्मुक्तः स वै ज्ञानी शिव एव न संशयः।
तस्य दर्शनमात्रेण भुक्तिर्मुक्तिश्च जायते।।22।।

जीवन्मुक्त हुआ वह ज्ञानी शिवरूप ही है, इसमें सन्देह नहीं, उसके दर्शनमात्र से भुक्ति मुक्ति हो जाती है।।22।।

शिवं यः पूजयेन्नित्यं कृत्वा लिङ्गं तु पार्थिवम्।
यावज्जीवनपर्यन्तं स याति शिवमन्दिरम्।।23।।

जो पार्थिव शिवलिङ्ग बनाकर नित्य शिवजी का पूजन करता है और जीवनपर्यंत शिवजी का पूजन करने वाला शिवजी के लोक में जाता है।।23।।

मृडेनाप्रमितान्वर्षाञ्छिवलोके हि तिष्ठति।
सकामः पुनरागत्य राजेन्द्रो भारते भवेत्।।24।।

वह शिवपूजन से अनन्त वर्षों तक शिवलोक में स्थित होता है और सकाम पूजन करने से भरतखण्ड का राजा होता है।।24।।

निष्कामः पूजयेन्नित्यं पार्थिवं लिङ्ग मुत्तमम्।
शिवलोके सदा तिष्ठेत्तस्य सायुज्यमाप्नुयात्।।25।।

और जो नित्य पार्थिव शिवलिङ्ग की कामना रहित पूजन करता है, वह सदा शिवलोक में स्थित होकर सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है।।25।।

 पार्थिवं शिवलिङ्गं च विप्रो यदि न पूजयेत्।
स याति नरकं घोरं शूलप्रोतं सुदारुणम्।।26।।

यदि ब्राह्मण शिवजी के पार्थिव लिङ्ग स्वरूप का पूजन न करे, तो वह शूल नामक घोर नरक को प्राप्त होता है।।26।।

यथाकथञ्चिद्विधिना रम्यं लिङ्गं प्रकारयेत्।
पञ्चसूत्रविधानं च पार्थिवे न विचारयेत्।।27।।

जिस किसी विधि से हो शिवलिङ्ग को मनोहर बनावें, पञ्चसूत्र का विचार पार्थिवलिङ्ग में न करें।।27।।

अखण्डं तद्धि कर्तव्यं न विखण्डं प्रकारयेत्।
विखण्डं तु प्रकुर्वाणो नैव पूजाफलं लभेत्।।28।।

अखण्ड शिवलिङ्ग का निर्माण करना चाहिये, शिवलिङ्ग दो खण्ड का करने से पूजा- फल की प्राप्ति नहीं होती है।।28।।

रत्नजं हेमजं लिङ्गं पारदं स्फाटिकं तथा।
पार्थिवं पुष्प रागोत्थमखण्डं तु प्रकारयेत्।।29।।

रत्न, सुवर्ण, पारद, स्फटिक, पार्थिव, पुष्पराग से उत्पन्न अखण्ड लिङ्ग की कल्पना करें।।29।।

 अखण्डं तु चरं लिङ्गं द्विखण्डमचरं स्मृतम्।
खण्डाखण्डविचारोऽयं सचराचरयोः स्मृतः।।30।।

चरलिङ्ग अखण्ड और अचर द्विखण्ड कहलाता है। यह खण्ड-अखण्ड का विचार चराचर में होता है।।30।।

वेदिका तु महाविद्या लिङ्गं देवो महेश्वरः।
अतो हि स्थावरे लिङ्गे स्मृता श्रेष्ठा द्विखण्डता।।31।।

वेदिका महाविद्या है, महेश्वरदेव लिङ्गरूप है, इस कारण स्थावर लिङ्ग में द्विखण्डता कही है।।31।।

द्विखण्डं स्थावरं लिङ्गं कर्तव्यं हि विधानतः।
अखण्डं जङ्गमं प्रोक्तं शैवसिद्धान्तवेदिभिः।।32।।

विधान से स्थावरलिङ्ग दो खण्ड का करना चाहिये। शैवसिद्धान्त के जानने वालों ने जंगम शिवलिङ्ग को अखण्ड कहा है।।32।।

द्विखण्डं तु चरं लिङ्गं कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः।
नैव सिद्धान्तवेत्तारो मुनयः शास्त्रकोविदाः।।33।।

चरलिङ्ग को अज्ञान से मोहित हुए दो खण्ड का करते हैं, वे मुनि शास्त्र में पण्डित और सिद्धांत के जानने वाले नहीं है।।33।।

 अखण्डं स्थावरं लिङ्गं द्विखण्डं चरमेव च।
ये कर्वन्ति नरा मूढा न पूजाफलभागिनः।।34।।

स्थावरलिङ्ग अखण्ड और चरलिङ्ग द्विखण्ड है। जो विधि का उल्लंघन करते हैं वे पूजा के फलभागी नहीं हैं।।34।।

तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना अखण्डं चरसंज्ञकम्।
द्विखण्डं स्थावरं लिङ्गं कर्तव्यं परयामुदा।।35।।

इस कारण शास्त्रोक्त विधान से अखण्ड चरसंज्ञक शिवलिङ्ग का और दो खण्ड युक्त स्थावर शिवलिङ्ग का निर्माण करें।।35।।

अखण्डे तु चरे पूजा सम्पूर्णफलदायिनी।
द्विखण्डे तु चरे पूजा महाहानि प्रदा स्मृता।।36।।

अखण्ड रूप चर शिवलिङ्ग में की हुई पूजा सम्पूर्णतः फल को देने वाली है। दो खण्ड युक्त चर शिवलिङ्ग में कई हुई पूजा महाहानि देती है।।36।।

अखण्डे स्थावरे पूजा न कामफलदायिनी।
प्रत्यवायकरी नित्यमित्युक्तं शास्त्रवेदिभिः।।37।।

अखण्ड स्थावर शिवलिङ्ग में की हुई पूजा कामयुक्त फल को नहीं देती है और विघ्न करने वाली है, ऐसा शास्त्र जानने वालों ने कहा है।।37।।

इति शिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वर संहितायां साध्य साधन खण्डे पार्थिव शिवलिङ्ग पूजन माहात्म्य वर्णनं नामैकोनविंशोऽ ध्यायः।।19।।
🙏जय बाबा की🙏
बाबाचरण दास