Sunday, 16 June 2019

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता - अथ षष्ठोऽध्यायः

ॐश्रीशिवमहापुराणम्ॐ
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता - अथ षष्ठोऽध्यायः

नन्दिकेश्वर उवाच

पुरा कदाचिद्योगीन्द्र विष्णुर्विषधरासनः।
सुष्वाप परया भूत्या स्वानुगैरपि संवृतः।1।

नंदिकेश्वर जी बोले---

हे योगीन्द्र! पहले एक समय अपने गरुणादि पार्षदों से संयुक्त भगवान विष्णु जी लक्ष्मी सहित शेषशय्या पर शयन करते थे।1।

यदृच्छयागतस्तत्र ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
अपृच्छत् पुण्डरीकाक्षंं शयानं सर्वसुन्दरम्।2।

उस समय ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ब्रह्मा जी अपनी इच्छा से ही वहाँ आये। सर्व प्रकार सुन्दर सेज पर शयन करते हुए कमल लोचन विष्णुजी से पूछने लगे।2।

कस्त्वं पुरूषवच्छेषे दृ्ष्ट्वा मामपिदृप्तवत्।
उत्तिष्ठ वत्स मां पश्य तव नाथमिहागतम्।3।

तुम कौन हो, जो मुझे देखकर अभिमानी पुरुष के समान शयन करते हो? हे वत्स? उठो, देखो मैं तुम्हारा स्वामी आया हूँ।3।

आगतं गुरूमाराध्यमं दृ्ष्ट्वायो दृप्तवच्चरेत।
द्रोहिणस्तस्य मूढस्य प्रायश्चित्तं  विधीयते।4।

आये हुए गुरु को देखकर जो अभिमान करता है, इस द्रोही मूढ़ का प्रायश्चित होना उचित है।

इति श्रुत्वा वचः क्रुद्धो बहिः शान्तवदाचरन्।
स्वस्ति ते स्वागतमं वत्स तिष्ठ पीठमितो विश।5। 

यह सुनकर विष्णु जी के अन्तर में क्रोध तो हुआ, परंतु बाहर से शान्त रहे और बोले, वत्स! आपका मंगल हो। बैठिये, इस आसन पर विराजिये।5।

किमु ते व्यग्र वद्वक्त्रं विभाति विषमेक्षणम्।

ब्रह्मोवाच

वत्स विष्णो महामानमागतं कालवेगतः।6।

इस समय आपका नेत्र कुटिल और मुख वक्र क्यों हो रहा है? 
ब्रह्माजी बोले ---हे वत्स विष्णु! तुमको समय के प्रभाव से अभिमान है।6।

पितामहश्च जगतः पाता च तव वत्सक।

विष्णुरुवाच

मत्स्थं जगदिदं वत्स मनुषे त्वं हि चोरवत्।7।

हे पुत्र! मैं आपका रक्षक और जगत का पितामह हूँ।
विष्णु जी बोले--यह तो सब जगत मुझमें स्थित है, फिर आप चोर के समान किस प्रकार अपना कहते हो।7।

मन्नाभिकमलाज्जातः पुत्रस्त्वं भाषसे वृथा।

नन्दिकेश्वर उवाच

एवं हि वदतोस्तत्र मुग्धयोरजयोस्तदा।8।

आप मेरी नाभिकमल से उत्पन्न हुए हो, इस कारण मेरे पुत्र हो, आपका मुझे पुत्र कहना वृथा है। 

नंदिकेश्वर जी बोले---इस प्रकार ब्रह्मा तथा विष्णुजी दोनों ही रजोगुण से मुग्ध होकर विवाद करने लगे।8।
अहमेव वरोन त्वमहं प्रभुरहं प्रभुः।
परस्परं हन्तुकामो चक्रतुः समरोद्यमम्।9।

मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं स्वामी हूँ, ऐसा कहकर एक दूसरे को मारने की इच्छा से युद्ध करने में उत्सुक हुए।9।

युयुधातेऽमरौ वीरौ हंसपक्षन्द्रवाहनौ।
वैरञ्च्या वैष्णवाश्चैवं मिथो युयुधिरे तदा।10।

और अपने हंस और गरुण वाहन पर स्थित होकर वे दोनों देव युद्ध करने में लगे। तब ब्रह्मा और विष्णु जी के वाहन गण भी युद्ध करने लगे।10।

तावद्विमानगतयः सर्वां वै देवजातयः।
दिदृक्षवः समाजग्मुः समरं तं महाद्भूतम्।11।

तब सर्व देवता विमानों में बैठकर उस महाद्भूत युद्ध को देखने चले आये।11।

क्षिपन्तः पुष्पवर्षाणि पशयन्तः स्वैरमुम्बरे।
सुपर्णवाहनस्तत्र क्रुद्धो वै ब्रह्मवक्षसि।12।

मुमोच बाणानसहानस्त्रांश्च विविधान बहून्।
मुमोचाथ विधिः क्रुद्धो विष्णोरुरसि दुःसहान्।13।
बाणाननलसंकाशानस्त्रांश्च बहुशस्तदा।
तदाश्चर्यमिति स्पष्टे तयोः समरगोचरम्। 14।

और आकाश से उनके ऊपर फूल वर्षाने लगे तब विष्णुजी ने क्रोध कर ब्रह्मा जी की छाती में अनेक प्रकार के बाण और अस्त्र मारे और ब्रह्माजी ने भी महा क्रोध कर विष्णु जी के हृदय में अग्नि के समान दुःसह बाण और अनेक शस्त्र मारे। उस युद्ध में यह बड़े आश्चर्य का व्यापार होने लगा।12-13-14।

समीक्ष्य दैवतगणाः शशंसूर्भँशमाकुलाः।
ततो विष्णुः सुसंक्रुद्धः श्वसन् व्यसनकर्शितः।15।
माहेश्वरास्त्रं मतिमान् सन्दधे ब्रह्मणोपरि।
ततो ब्रह्मा भर्शं क्रुद्धः कम्पयन् विश्वमेव हि।16।
अस्त्रं पाशुपतं घोरं सन्दधे विष्णु वक्षसिः।
ततस्तदुत्थितं वयोम्नि तपनायुतसन्निभम्।17।

और उनका युद्ध देखकर देवता अत्यंत व्याकुल होने लगे। तब विष्णुजी ने श्वास लेते हुए युद्ध से कुछ श्रांत होकर, क्रोध करके बुद्धिमानी से ब्रह्माजी के ऊपर माहेश्वर अस्त्र का प्रयोग किया तब ब्रह्माजी ने महाक्रोध कर विश्व  को कम्पित करते हुए घोर पाशुपतास्त्र विष्णुजी की छाती पर चलाया, उस समय आकाश में दशसहस्त्र सूर्य के समान तेज उठा।15-16-17।

सहस्त्रमुखमत्युग्रं चण्डवात भयंकरम्।
अस्त्रद्वयमिदं तत्र ब्रह्मविष्णवोर्भयंकरम्18। 

इत्थं बभूव समरं ब्रह्मविष्णवोः परस्परम्।
ततो देवगणाः सर्वे विष्ण्णा भृशमाकुलाः।
ऊचुः परस्परं तात राजक्षोभेयथाद्विजाः।19।

जिसके सहस्त्र मुख जो अति उग्र और तीक्ष्ण था। उस समय महा भयंकर तीक्ष्ण पवन चलने लगी।जब ब्रह्मा और विष्णु जी के दोनों भयंकर अस्त्र उदय हुए तब घोर उपद्रव हुए। जब इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु जी का परस्पर युद्ध हुआ, समस्त देवता अत्यंत व्याकुल और उद्विग्न हो गए।18--19।

सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः।
यस्मात् प्रवर्तते तस्मै ब्रह्मणे च त्रिशूलने।20।

अशयमन्यैर्यदनुग्रहं विना।
तृणक्षयोऽ प्यत्र यदृच्छया क्वचित।21।

हे तात जैसे राजक्षोभ में ब्राह्मण क्षुभित होते हैं, उसी प्रकार वे व्याकुल होकर बोले--- सृष्टि की स्थिति, तिरोभाव और अनुग्रह जिनसे होता है त्रिशूलधारी ब्रह्म के अनुग्रह के बिना, इच्छा से कोई  भी एक तृण को भी नष्ट करने में समर्थ नहीं है।20--21।

इति देवा भयं कृत्वा विचिन्वन्तः शिवक्षयम्।
जग्युः कैलाश शिखां यत्रास्ते चन्द्रशेखरः।22।

इस प्रकार भयभीत होकर सर्व देवता शिवजी के स्थान की खोज करते करते कैलाश के शिखर पर शिवजी के पास गये ।22।

दृष्ट्वैवममरा हृष्टाः पदं तत्पारमेश्वरम्।
प्रणेमुः प्रणवाकारं प्रविष्टास्तत्र सद्मनि।23।

तेऽपि तत्र सभामध्ये मण्डपे मणिविष्टरे।
विराजमानमुमया ददृशुर्देवपुङ्गवम्।24।

देवता प्रसन्न हो उस परमेश्वरपद प्रणवाकार को देखकर प्रणाम करके स्थिति हुए और उस स्थान में प्रवेश करके उस सभा मंडल में मणि के विस्तर पर पार्वती सहित विराजमान देवश्रेष्ठ को देखा।23-24।

सव्योत्तरेतरपदं तदर्पितकराम्बुजम्।
स्वगणैः सर्वतो जुष्टं सर्वलक्षणलक्षितं।25।

वीज्यमानं विशेषज्ञैः स्त्रीजनैस्तीव्रभावनैः।
शंस्यामानं सदा वेदैरनुगृह्णन्तमीश्वरम्।26।

वाम पद के ऊपर दक्षिण पद रखे हुए शिवजी के निमित्त अपना करकमल अर्पण किये अपने गणों से सब प्रकार वेष्टित सम्पूर्ण लक्षणों से लक्षित महाभक्ति युक्त स्त्रीजन जो विशेष उपचार जानती थीं, वे पंखा कर रही थीं। वेद स्तुति करते थे और अनुग्रह की दृष्टि से सबको देखते थे। 25-26।

दृष्ट्वैवमीशममराः संतोषसलिलेक्षणाः।
दण्डवद् दूरतो वत्स नमश्चक्रुर्मणाः।27।

हे कुमार ! दूर से ही शिवजी का दर्शन करके संतोष का जल नेत्रों में भरे वह देवताओं का महा समूह दूर से नमस्कार करने लगा।27।

तानवेक्ष्य पतिर्देवान् समीपे चाह्वयद् गणै।
अथ संह्लादयन् देवान् देवो देवशिखामणिः।
अवोचदथ गम्भीरं वचनं मधुमङ्गलम्।28।

उन देवताओं को देखकर गणों द्वारा उन्हें बुलाकर देवदेव महादेव  देवताओं को प्रसन्न करते हुए मधुर और मंगलयुक्त वचन गम्भीर वाणी से बोले।28।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां देवानां कैलाशयात्रावर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः।6।

🙏जय बाबा की🙏

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ पंचमोऽध्यायः

ॐश्रीशिवमहापुराणम्ॐ
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथ पंचमोऽध्यायः

सूत उवाच

श्रवणादित्रिकेऽशक्तो लिङ्गंवेरं च शांकरम्।
संस्थाप्य नित्यमभ्यर्च्य तरेत संसार सागरम्।1।

सूतजी कहते हैं--

शौनक जो श्रवण, कीर्तन और मनन इन तीनों साधनों के अनुष्ठान में समर्थ न हो, वह भगवान शंकर के लिङ्ग एवं मूर्ति की स्थापना करके नित्य उसकी पूजा करे तो संसार सागर से पार हो सकता है।1।

अपि द्रव्यं वहेदेव यथाबलमवञ्चयन्।
अर्पयेल्लिङ्ग वेरार्थमर्चयेदपि सन्ततम्।2।

वञ्चना अथवा छल न करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार धनराशि ले जाय औऱ उसे शिवलिंग अथवा शिवमूर्ति की सेवा के लिए अर्पित कर दे। साथ ही निरन्तर उस लिङ्ग एवं मूर्ति की पूजा भी करे।2।

मण्डपंं गोपुरं तीर्थं मठं क्षेत्रं तथोत्सवम्।
वस्त्रं गन्धं च माल्यं च धूपं दीपं च भक्तितः।3।

विविधान्नं च नैवेद्यमपूपव्यंजनैर्युतम्।
छत्रं ध्वजंं च व्यंजनं चामरं चापि साङ्गकम्।4।

उसके लिए भक्तिभाव से मंडप, गोपुर, तीर्थ,मठ एवं क्षेत्र की स्थापना करे तथा उत्सव रचाये। वस्त्र,गन्ध,पुष्प,धूप, दीप तथा पूआ और शाक आदि व्यन्जनौं से युक्त भाँति भाँति के भक्ष्य भोजन अन्न नैवेद्य के रूप मैं समर्पित करे। छत्र, ध्वजा, व्यंजन, चामर तथा अन्य अंगों सहित राजोपचार की भाँति सब सामान भगवान शिव के लिङ्ग एवं मूर्ति को चढ़ाये।3-4।

राजोपचारवत् सर्वं धारयेल्लिङ्गवेरयोः।
प्रदक्षिणां नमस्कारं यथाशक्ति जपं तथा।5।

राजोपचार की भाँति सब सामान भगवान शिव के लिङ्ग एवं मूर्ति को चढ़ाये। प्रदक्षिणा, नमस्कार तथा यथाशक्ति जप करे।5।

आवाहनादि सर्गान्तं नित्यं कुर्यात सुभक्तितः।
इत्थमभ्यर्चयन देवं लिङ्गे वेरे च शांकरे।6।

सिद्धिमेति शिवप्रीत्या हित्वापि श्रवणादिकम्।
लिङ्गवेरार्चनामात्रान्मुक्ताः पूर्वेमहाजनाः।7।

 आवाहन से लेकर विसर्जन तक का सारा कार्य प्रतिदिन भक्तिभाव से सम्पन्न करे। इस प्रकार शिवलिङ्ग अथवा शिवमूर्ति में भगवान शंकर की पूजा करने वाला पुरुष श्रवणादि साधनों का अनुष्ठान न करे तो भी भगवान शिव ली प्रसन्नता से सिद्धि प्राप्त कर लेता है। पहले के बहुत से महात्मा पुरुष लिङ्ग तथा शिवमूर्ति की पूजा करने मात्र से भवबंधन से मुक्त हो चुके हैं।6-7।

मुनयु ऊचुः

वेरमात्रे तु सर्वत्र पूज्यन्ते देवतागणाः।
  लिङ्गे वेरे च सर्वत्र कथं सम्पूज्यते शिवः।8।

ऋषियों ने पूछा  मूर्ति में ही सर्वत्र देवताओं की पूजा होती है लिङ्ग में नही, परन्तु भगवान शिव की पूजा सब जगह मूर्ति मैं और लिङ्ग में भी क्यों कि जाती है।8।

सूत उवाच

अहो मुनीश्वराः पुण्यं प्रश्न मेतन्महाद्भूतम्।
अत्र वक्ता महादेवो नान्योऽस्ति पुरुषः क्वचित।9।
सूतजी कहते हैं मुनिश्वरों तुम्हारा यह प्रश्न तो बड़ा ही पवित्र और अत्यंत अद्भुत है। इस बिषय में महादेव जी ही वक्ता हो सकते हैं। दूसरा कोई पुरुष कभी और कहीं भी इसका प्रतिपादन नहीं कर सकता।9। 

शिवेनोक्तं प्रवक्ष्यामि क्रमाद गुरूमुखाच्छ्रुतम्।
शिवेकौ ब्रह्मरूपत्वान्निष्कलः परिकीर्तितः।10।

इस प्रश्न के समाधान के लिए भगवान शिव ने जो कुछ कहा है औऱ उसे मैने गुरुजी के मुख से जिस प्रकार सुना है उसी तरह क्रमशः वर्णन करूँगा। एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्म रूप होने के कारण निष्कल या निराकार कहे गये हैं।10।

 रूपित्वात् सकलस्तद्वत्तस्मात् सकलनिष्कलः।
निष्कलत्वानिराकारं लिङ्गंं तस्य समागतम्।11।

रूपवान होने के कारण उन्हें सकल भी कहा गया है। इसलिए वे सकल और निष्कल दोनों हैं।
शिव के निष्कल निराकार होने के कारण ही उनकी पूजा का आधारभूत लिङ्ग भी निराकार ही प्राप्त हुआ है अर्थात शिवलिङ्ग शिव के निराकार स्वरुप का ही प्रतीक है।11।

सकलत्वात् तथा वेरं साकारं तस्य संगतम्।
सकलाकलरूपत्वाद् ब्रह्मशब्दाभिदः परः।12।

 और सगुण होने से साकार वेर रूप हैं। यह सगुण निर्गुण रूप होने से शब्दब्रह्म नाम से सबसे परे हैं।12।

देवता मौनरुप कलामात्र होने से बेर में अर्चन करते हैं, शंकरजी के शिवाय औरौं मैं जीवत्व है और शंकर जी मैं ब्रह्मत्व है।13-14-15।

वेदांतसार संसिद्धं प्रणवार्थै प्रकाशनात्।
एवमेव पुरा पृष्टो मन्दरे नन्दिकेश्वरः।16।

सनत्कुमार मुनिना ब्रह्मपुत्रेणधीमता।
शिवान्य देववश्यानां सर्वेषामपि सर्वतः।17।

वेरमात्रं च पूजार्थं श्रुतं दृष्टं च भूरिशः।
शिव मात्रस्य पूजायां लिङ्गंं वेरं च दृष्यते।18।

पूर्वकाल में बुद्धिमान ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनि ने  मंदराचल पर नंदिकेश्वर से इसी प्रकार का प्रश्न किया था। सनत्कुमार बोले --भगवन शिव से भिन्न जो देवता हैं। उन सबकी पूजा के लिए सर्वत्र प्रायः वेर (मूर्ति) मात्र ही अधिक संख्या में देखा और सुना जाता है। केवल भगवान शिव की ही पूजा में लिङ्ग और वेर (मूर्ति) दोनों का उपयोग देखने में आता है। अतः कल्याणमय नंदिकेश्वर इस विषय में जो तत्त्व की बात हो, उसे मुझे इस प्रकार बताइये, जिससे अच्छी तरह समझ में आ जाय।16-17-18।

अतस्तद् ब्रूहि कल्याण तत्त्वं मे साधुबोधनम्।
अनुत्तरमिमं प्रश्नं रहस्यं ब्रह्मलक्षणम्ः19।

कथयामि शिवेनोक्तं भक्तियुक्तस्य तेऽनघ।
शिवस्य ब्रह्मरूपत्वान्निष्कलत्वाच्च निष्कलम्।20।

लिङ्गं तस्यैव पूजायां सर्ववेदेषु सम्मतम्।
तस्यैव सकलत्वाच्च तथा सकलनिष्कलम्।21।

नंदिकेश्वर ने कहा--निष्पाप ब्रह्मकुमार! आपके इस प्रश्न का हम जैसे लोगों के द्वारा कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह गोपनीय विषय है और लिङ्ग साक्षात ब्रह्म का प्रतीक है। तथापि आप शिवभक्त हैं। इसलिए इस विषय में भगवान शिव ने जो कुछ बताया है, उसे ही आपके समक्ष कहता हूँ। भगवान शिव ब्रह्मस्वरूप और निष्कल (निराकार) हैं। इसलिए उन्हीं की पूजा में निष्कल लिङ्ग का उपयोग होता है। संपूर्ण वेदों का यही मत है।19-20-21।

सकलं च तथा वेरं पूजायां लोकसम्मतम्।
शिवान्येषां च जीवत्वात सकलत्वाच्च सर्वतः।22।

सगुण पूजा में लोकसम्मत बेर में पूजन करना और शिवजी से अन्य देवता जीवरूप होने से सब प्रकार कलायुक्त ही हैं।22।

वेरमात्रं च पूजायां सम्मतं वेदनिर्णये।
स्वाविर्भावे च देवानां सकलं रूपमेव हि।23।

वेद मैं निर्णय करके पूजन मैं बेरमात्र का परिमाण कहा है, कारण कि देवता के आविर्भाव होने से उसका सकल रूप दिखता है।23।

शिवस्य लिङ्गंं वेरं च दर्शने दृश्यते खलु।
उक्तं त्वया महाभाग लिङ्गंंवेरप्रचारणम्।24।

शिवस्य च तदन्येषां विभज्य परमार्थतः।
तस्मात्तदेव परमं लिङ्गंं वेरादिसम्भवम्।25।

श्रोतुमिच्छामि योगीन्द्र लिङ्गाविर्भावलक्षणम्।
श्रृणु वत्स भवत्प्रीत्या वक्ष्यामि परमार्थतः।26।

शिवजी का लिङ्गबेर पूजन शिवशास्त्र मैं दिखता तो है, परंतु वह निर्गुण होने से प्रमाण रहित भी है,
 सनत्कुमार बोले महाभाग योगीन्द्र! आपने भगवान शिव तथा दूसरे देवताओं के पूजन में लिङ्ग और वेर के प्रचार का जो रहस्य विभाग पूर्वक बताया है, वह यथार्थ है। इसलिये लिङ्ग और वेर की आदि उत्पत्ति का जो उत्तम वृत्तांत है, उसी को मैं इस समय सुनना चाहता हूँ। लिङ्गके प्राकट्य का रहस्य सूचित करने वाला प्रसंग मुझे सुनाइये। नन्दिकेश्वर जी बोले  हे वत्स! सुनिये, मैं आपको प्रीति पूर्वक सुनाता हूँ।24-25-26।

पुराकल्पे महाकाले प्रपन्ने लोकविश्रुते।
अयुध्येतां महात्मानौ ब्रह्मविष्णू परस्परम्।27।

पूर्व काल में जो पहला कल्प था, जो लोक में विख्यात है, उस समय महात्मा ब्रह्मा जी और विष्णु जी का परस्पर युद्ध हुआ था।27।

तयोर्मानं निराकर्तुं तन्मध्ये परमेश्वरः।
निष्कल स्तम्भ रुपेण स्वरुपं समदर्शयत्।28।

उनका मान दूर करने निमित्त उन निष्कल परमात्मा ने उन दोनों के बीच में अपना स्तंभरूप स्वरूप दिखाया।28।

ततः स्वलिङ्गचिह्रत्वात् स्तम्भतो निष्कलं शिवः।
स्वलिङ्गं दर्शयामास जगतां हितकाम्यया।29।

तब जगत  के हित की इच्छा से निर्गुण शिवजी ने उस तेजोमय स्तम्भ से अपना लिंगाकार का स्वरूप दिखाया।29।
  
तदाप्रभृतिलोकेषु निष्कलं लिङ्गमैश्वरम्।
सकलं च तथा वेरं शिवस्यैव प्रकल्पितम्।30।
उसी दिन से वह निष्कल शिवजी का लिङ्गाकार स्वरूप विख्यात हुआ और सगुण रूप में वेर रुप की कल्पना की गयी।30।

शिवान्येषां तु देवानां वेरमात्रं प्रकल्पितम्।
तत्तद् वेरं तु देवानां तत्तद्भोगप्रदं शुभम्।
शिवस्य लिङ्ग वेरत्वं भोगमोक्षप्रदं शुभम्।31।

देवताओं की वह बेरपूजा इच्छानुसार भोगों को देने वाली है, परन्तु शिवजी की लिङ्ग बेरपूजा भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली है।31।

इति श्री शिवमहापुराणेे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवलिङ्गमहिमवर्णनं नाम पंचमोऽध्यायः।।5।।

🙏जय बाबा की🙏

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ चतुर्थोऽध्यायः

 ॐश्रीशिवमहापुराणम्ॐ
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता - अथ चतुर्थोऽध्यायः ॐ 
|| संकलन - बाबा चरणदास || 

पूजाजपेशगुणरूपविलास नाम्नां युक्ति प्रियेण मनसा परिशोधनं यत्।
तत्सन्ततं मननमीश्वर दृष्टि लभ्यं सर्वेषु साधनवरेष्वपि मुख्यमुख्यम्।1।

भगवान शंकर की पूजा, उनके नामों के जप तथा उनके गुण, रूप, विलास और नामों का युक्ति परायण चित्त के द्वारा जो निरंतर परिशोधन या चिंतन होता है, उसी को मनन कहा गया है। वह महेश्वर की कृपा दृष्टि से उपलब्ध होता है। उसे समस्त श्रेष्ठ साधनों में प्रधान या प्रमुख कहा गया है।1।

सूत उवाच

अस्मिन् साधनमाहात्मये पुरावृत्तं मुनीश्वराः।
युष्मदर्थं प्रवक्ष्यामि श्रृणुध्वमवधानतः।2।

सूत जी कहते हैं--मुनिश्वरो इस साधन का महात्म्य बताने के प्रसंग में मैं आप लोगों के लिये एक प्राचीन वृतान्त का वर्णन करुँगा, उसे ध्यान देकर आप सुनें।2।

पुरामम गुरूर्व्यासः पराशरमुनेः सुतः।
तपश्चार सम्भ्रान्तः सरस्वत्यास्तटे शुभे।3।

पहले की बात है, पराशर मुनि के पुत्र मेरे गुरु व्यासदेव जी सरस्वती नदी के सुन्दर तट पर तपस्या कर रहे थे।3।

गच्छन यदृच्छया तत्र विमानेनार्करोचिषा।
सनत्कुमारो भगवान ददर्श मम देशिकम्।4।

एक दिन सूर्यतुल्य तेजस्वी विमान से यात्रा करते हुए भगवान सनत्कुमार अकस्मात वहाँ जा पहुँचे।4।

ध्यानारुढ़ः प्रबुद्धोऽसौ ददर्शतमजात्मजम्।
प्रणिप्रत्याह सम्भ्रांतः परं कौतूहलं मुनिः।5।

दत्त्वार्घ्यमस्मै प्रददौ देवयोग्यं च विष्टरम्।
प्रसन्नः प्राह तं प्रह्वं प्रभुर्गम्भीरया।6।

उन्होंने मेरे गुरू को वहाँ देखा। वे ध्यान में मग्न थे। उससे जगने पर उन्होंने ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार जी को अपने सामने उपस्थित देखा।
देखकर वे बड़े वेग से उठे और उनके चरणों में प्रणाम करके मुनि ने उन्हें अर्घ्य दिया और देवताओं के वैेठने योग्य आसन भी अर्पित किया। तब प्रसन्न हुए भगवान सनत्कुमार विनीत भाव से खड़े हुए व्यास जी से गम्भीर वाणी में बोले--।5-6।

सनत्कुमार उवाच

सत्यं वस्तु मुने दध्याः साक्षात्करणगोचरः।
स शिवोऽथ सहायोऽत्र तपश्चरसि किंकृते।7।

मुने तुम सत्य वस्तु का चिंतन करो। वह सत्य पदार्थ भगवान शिव ही हैं। जो तुम्हारे साक्षात्कार के विषय होंगे।7।

श्रवणं कीर्तनं शम्भोर्मननं च महत्तरम्।
त्रयं साधनमुक्तंच विद्यते वेदसम्मतम्।8।
भगवान शंकर का श्रवण, कीर्तन,मनन ये तीन महत्तर साधन कहे गए हैं। ये तीनों ही वेद सम्मत हैं।8।

पुराहमथ सम्भ्रान्तो ह्यन्यसाधनसम्भ्रमः।
अचले मन्दरे शैले तपश्चरणमाचरम्।9।

 पूर्वकाल में मैं दूसरे दूसरे साधनों के संभ्रम में पड़कर घूमता घामता मंदराचल पर जा पहुंचा और वहाँ तपस्या करने लगा।9।

शिवाज्ञया ततः प्राप्तो भगवान नन्दिकेश्वरः।
स मे दयालुर्भगवान् सर्वसाक्षी गणेश्वर।10।
उवाच मह्यं सस्नेहं मुक्तिसाधनमुत्ततम्।
श्रवणं कीर्तनं शम्भोर्मननं च महत्तरम्।11।

तदनन्तर महेश्वर शिव कीआज्ञा से भगवान नंदिकेश्वर वहाँ आये उनकी मुझ पर* बड़ी दया थी।
वे सबके साक्षी तथा शिवगणों के स्वामी भगवान नंदिकेश्वर मुझे स्नेह पूर्वक मुक्ति का उत्तम साधन बताते हुए बोले- भगवान शंकर का श्रवण, कीर्तन,मनन ये तीन महत्तर साधन कहे गए हैं। ये तीनों ही वेद सम्मत हैं।10-11।

त्रिकं च साधनं मुक्तेः शिवेन मम भाषितम्।
श्रवणादित्रिकं ब्रह्मन् कुरुष्वेति मुहुर्मुहुः।12।

भगवान शंकर का श्रवण, कीर्तन और मनन ये तीनों साधन वेदसम्मत हैं और मुक्ति के साक्षात कारण हैं। यह बात स्वयं शिव ने मुझसे कही है। अतः ब्रह्मन तुम श्रवणादि तीनों साधनों का ही अनुष्ठान करो।12।

एवमुक्त्वा ततो व्यासंं सानुगो विधिनन्दनः।
जगाम स्वविमानेन पदं परमशोभनम्।13।

 व्यास जी से बारम्बार ऐसा कहकर अनुगामियों सहित ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार परम् सुंदर ब्रह्म धाम को चले गये।13।

एवमुक्तं समासेन पूर्ववृत्तान्तमुत्तमम्।
श्रवणादित्रियं सूत मुक्त्युपायस्त्वयेरितः14।

श्रवणादित्रिकेऽशक्तः किं कृत्वा मुच्यते जनः।
अयत्रेनैव मुक्तिः स्यात् कर्मणा केन हेतुना।15।

 इस प्रकार पूर्वकाल के इस उत्तम वृत्तान्त  को मैने संक्षेप में वर्णन किया है। ऋषि बोले  सूतजी श्रवणादि तीन साधनों को आपने मुक्ति का उपाय बताया है। किंतु जो श्रवण आदि तीनों साधनों में असमर्थ हो, वह मनुष्य किस उपाय का अबलम्बन करके मुक्त हो सकता है। किस साधन भूत कर्म के द्वारा बिना यत्न के ही मोक्ष मिल सकता है।14-15।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे चतुर्थोऽध्यायः।।4।।

ॐ जय बाबा की ॐ 
|| बाबा चरण दास || 

प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ तृतीयो अध्यायः |

ॐश्रीशिवमहापुराणम्ॐ
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता - अथ तृतीयो अध्यायः
|| संकलन - बाबा चरणदास || 

इत्याकर्ण्य वचः सौतं प्रोचुस्ते परमर्षयः।
वेदांतसार सर्वस्वं पुराणं.श्रावयाद्भुतम्।1।

व्यासजी  कहते हैं---सूतजी का यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले
अब आप हमे वेदांतसार सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण की कथा सुनाइये।1।

श्रण्वन्तु ऋषयः सर्वे स्मृत्वा शिवमनामयम्।
पुराण प्रवणं शैवं पुराणंं वेदसारजम्।2।

सूतजी ने कहा--आप सब महर्षिगण रोग शोक से रहित कल्याणमय भगवान शिव का स्मरण करके पुराण प्रवर शिवपुराण की, जो वेद के सार तत्त्व से प्रकटहहुआ है, कथा सुनिये।2। 

यत्र गीतं त्रिकं प्रीत्या भक्ति ज्ञान विरागिकम्।3।

शिवपुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य इन तीनों काँ प्रीति पूर्वक गान किया गया है।3।

वेदान्तवेद्यं सद्वस्तु विशेषेण प्रवर्णितम्।4।

 और वेदान्तवेद्य सद्वस्तु का विशेष रुप से वर्णन है।4।

अस्मिन्नपुस्थिते कल्पे प्रवृत्ते सृष्टिकर्मणि।
मुनीनां षटकुलीनानां ब्रुवतामितरेतरस्।5।

इस वर्तमान कल्प में जब सृष्टि कर्म आरम्भ हुआ था, उन दिनों छः कुलों के महर्षि परस्पर वाद विवाद करते हुए कहने लगे ।5।

इदं परमिदं नेति विवादः सुमहानभूत।
तेऽभिजग्मुर्विधातारं ब्रह्माणं प्रष्टुमव्ययम्।6।

अमुक वस्तु सबसे उत्कृष्ट है और अमुक नहीं है। उनके इस विवाद ने अत्यन्त महान रूप धारण कर लिया। तब वे सब के सब अपनी शंका के समाधान के लिये सृष्टि कर्ता अविनाशी ब्रह्मा जी के पास गये ।6।

वाग्भिर्विनयगर्भाभिः सर्वे प्राञ्जलयोऽब्रुवन।
त्वं हि सर्वजगद्धाता सर्वकारणकारणं।7।

और हाथ जोड़कर विनयभरी वाणी में बोले प्रभो आप सम्पूर्ण जगत को धारण पोषण करने वाले तथा समस्त कारणों के भी कारण हैं।7।

कः पुमान सर्वतत्त्वेभ्यः पुराणः परतःपरः।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।8।

हम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्त्वों से परे परात्पर पुराण पुरुष कौन हैं।8।

यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मा विष्णुरुद्रेन्द्र पूर्वकम्।
सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमः सम्प्रसूयते।9।

ब्रह्मा जी ने कहा जहाँ से मन सहित वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि से युक्त यह सम्पूर्ण जगत समस्त भूतों एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुआ है।9।

एष देवो महादेवः सर्वज्ञो जगदीश्वरः।
अयं तु परया भक्तया दृश्यते नान्यथा क्वचित्।10।

वे ही ये देव महादेव सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं। ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं। भक्ति  से ही इनका साक्षात्कार होता है।दूसरे किसी उपाय से कहीं इनका दर्शन नहीं होता।10।

रुद्रो हरिर्हरश्चैव तथान्ये च सुरेश्वराः।
भक्तया परमया तस्य नित्यं दर्शनकाङक्षिणः।11।

रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्ति भाव से उनका दर्शन करना चाहते हैं।11। 

बहुनात्र किमुक्तेन शिवे भक्त्याविमुच्यते ।
प्रसादादेवताभक्तिः प्रसादो भक्तिसम्भवः।
यथेहांकुरतो बीजं बीजतो वा यथांकुरः।12।

भगवान शिव में भक्ति होने से मनुष्य संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपा प्रसाद से उनमें भक्ति होती है और भक्ति से देवता का कृपाप्रसाद प्राप्त होता है, ठीक उसी तरह जैसे यहाँ अंकुर से बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है।12। 

तस्मादीशप्रसादार्थं यूयं गत्वा भुवं द्विजाः।
दीर्घसत्रं समाकृध्वं यूयं वर्ष सहस्त्रकम।13।

इसलिये तुम सब ब्रह्मऋषि भगवान शंकर का कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिए भूतल पर जाकर वहीं सहस्रों वर्षों तक चालू रहने वाले एक विशाल यज्ञ का आयोजन करो।13। 

अमुष्यैवाध्वरेशस्य शिवस्यैव प्रसादतः।
वेदोक्तविद्यासारं तु ज्ञायते साध्यसाधनम्।14।

इन यज्ञपति भगवान शिव की ही कृपा से वेदोक्त विद्या के सारभूत साध्य साधन का ज्ञान होता है।14।

साध्यंंशिवपदप्राप्तिः साधनं तस्य सेवनम्।साधकस्तप्रसादाद्यो नित्यादिफलनिःस्पृहः।15।*

शिवपद की प्राप्ति ही साध्य है। उनकी सेवा ही साधन है तथा उनके प्रसाद से जो नित्य नैमित्तिक आदि फलों की ओर से निःस्पृह होता है, वही साधक है।15।

कर्म कृत्वा तु वेदोक्तंं तदर्पितमहाफलम्।
परमेशपदप्राप्तिःसालोक्यादिक्रमात्ततः।16।

वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान करके उसके महान फल को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर देना ही परमेश्वर पद की प्राप्ति है। वही सालोक्य आदि के क्रम से प्राप्त होने वाली मुक्ति है।16।

तदभक्त्यनुसारेण सर्वेषां परमं फलम्।
तत्साधनं बहुविधं साक्षादीशेन बोधितम्।17।

उन उन पुरुषों की  भक्ति के अनुसार उन सबको उत्कृष्ट फल की प्राप्ति होती है। उस भक्ति के साधन अनेक प्रकार के है जिनका साक्षात महेश्वर ने ही प्रतिपादन किया है।17। 

सङ्क्षिप्य तत्र वः सारं साधनं प्रब्रवीम्यहम्।
श्रोत्रेण श्रवणं तस्य वचसा कीतनं तथा।18।
 मनसा मननं तस्य महासाधन मुच्यते।
श्रोतव्यः कीर्तितवयश्च मन्तव्यश्च महेश्वर।19।

उनमें से सारभूत साधन को  संक्षिप्त करके मैें बता रहा हूँ। कान से भगवान के नाम,गुण और लीलाओं का श्रवण, वाणी द्वारा उनका कीर्तन तथा मन के द्वारा उनका मनन, इन तीनों को महान साधन कहा गया है।
तात्पर्य यह कि महेश्वर का श्रवण, कीर्तन और मनन करना चाहिये।18--19।

इति श्रुतिः प्रमाणं नः साधनेनामुना परम्।
साध्यं व्रजत सर्वार्थसाधनैक परायणाः।20।

यह श्रुति का वाक्य हम सबके लिए प्रमाण भूत है। इसी साधन से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि में लगे हुए आप लोग पराम् साध्य को प्राप्त हों।20। 

प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्ट्वा तत्र लोकः प्रवर्तते।
अप्रत्यक्षं हि सर्वत्र ज्ञात्वा श्रोत्रेण चेष्टते।21।

लोग प्रत्यक्ष वस्तु को आँख से देखकर उसमें प्रवृत्त होते हैं। परंतु जिस वस्तु का कहीं भी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता, उसे श्रवणेन्द्रिय द्वारा जान सुनकर  मनुष्य उसकी प्राप्ति के लिये चेष्टा करता है। अतः पहला साधन श्रवण ही है।21।

तस्माच्छ्रवणमेवादौ श्रुत्वा गुरुमुखाद् बुधः।
ततः संसाधयेदन्यत् कीर्तनं मननं सुधीः।22।

उसके द्वारा गुरु के मुख से तत्त्व को सुनकर श्रेष्ठ बुद्धि वाला विद्वान पुरूष अन्य साधन कीर्तन एवं मनन की सिद्धि करे।22।

क्रमान्मननपर्यंते साधनेऽस्मिन् सुसाधिते।
शिवयोगो भवेत्तेन सालोक्यादिक्रमाच्छनैः।23।

 क्रमशः मनन पर्यन्त इस साधन की अच्छी तरह साधना कर लेने पर उसके द्वारा सालोक्य आदि के क्रम से धीरे धीरे भगवान शिव का संयोग प्राप्त होता है।23।

सर्वांगव्याधयः पश्चात् सर्वानन्दश्च लीयते।
अभ्यासात् क्लेशमेतद वैपश्चादाद्यन्त मंगलम्।24।
पहले सारे अंगों के रोग नष्ट हो जाते हैं। फिर सब प्रकार का लौकिक आनंद भी विलीन हो जाता है।24।

इति श्री शिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनविचारंं नाम तृतीयोऽध्यायः।।3।।

ॐ जय बाबा की ॐ 
|| बाबा चरण दास|| 




प्रथमा विद्येश्वरसंहिता अथ द्वितीयो अध्यायः

ॐश्रीशिवमहापुराणम्ॐ
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता-अथ द्वितीयो अध्यायः
||  संकलन - बाबा चरणदास || 

साधु पृष्टं साधवो वस्त्रैलोक्यहितकारकं।
गुरुं. स्मृत्वा भवत्स्नेहाद्वक्ष्ये तच्छृणुताददरात्।1।

सूतजी कहते है  साधु महात्माओ आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। आपका यह प्रश्न तीनों लोकों का हित करने वाला है। मैं गुरुदेव व्यास का स्मरण करके आप लोगों के स्नेहवस इस बिषय का वर्णन करूँगा। आप आदर पूर्वक सुने। 1।

वेदांत सारसर्वस्व पुराणं चैवमुत्तमम्।
सर्वाघौघोद्धारकरं परत्र परमार्थदम्।2।

सबसे उत्तम जो शिवपुराण है, वह वेदांत का सार सर्वस्व है तथा वक्ता और श्रोता का समस्त पापराशियों से उद्धार करने वाला है, इतना ही नहीं , वह परलोक में परमार्थ वस्तु को देने वाला है।2।

कलिकल्मषविध्वंसि यस्मिञ्छिवयशः परम्।
विजृम्भते सदा विप्राश्चतुर्वर्गफलप्रदम्।3।

 कलि की कल्मष राशि का विनाश करने वाला है। उसमें भगवान शिव के उत्तमम् यश का वर्णन है। ब्राह्मणो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों को देने वाला वह पुराण सदा ही अपने प्रभाव की दृष्टि से वृद्धि या  विस्तार  को प्राप्त हो रहा है।3।

तस्याध्ययनमात्रेण पुराणस्य द्विजोत्तमाः।
सर्वोतमस्य शैवस्य ते यास्यन्ति सुसद्गतिम।4।

विप्रवरो उस सर्वोत्तम शिवपुराण के अध्ययन मात्र से वे कलियुग के पापासक्त जीव श्रेष्ठतम गति को प्राप्त हो जाएंगे।4।

तावत्कलिम होत्पाताः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो।5।
*

कलियुग के महान उत्पात तभीतक जगत में निर्भय होकर विचरेंगे, जब तक यहां शिवपुराण का उदय नहीं होगा।5।

तदिदं शैवमाख्यातं पुराणं वेदसम्मितम्।
निर्मितं तच्छिवेनैव प्रथमं ब्रह्मसम्मितम्।6।

इसे वेद के तुल्य माना गया है। इस वेदकल्प पुराण का सबसे पहले भगवान शिव ने ही प्रणयन किया था।6।

विद्येशं च तथा रौद्रं वैनायकमथौमिकम्।
मात्रं रुद्रैकादशकं कैलासं शतरुद्रकम्।7।
कोटिरुद्रसहस्त्राद्यं कोटिरुद्रं तथैव च।
वायवीयंं धर्मसंज्ञं पुराणमिति भेदतः।8।

 विद्येश्वरसंहिता, रुद्र संहिता, विनायक संहिता, उमा संहिता, मातृसंहिता, एकादश रुद्र संहिता, कैलाससंहिता, शतरुद्रसंहिता, कोटिरुद्र संहिता, वायवीय संहिता तथा धर्म संहिता।7--8।

संहिता द्वादशमिता महापुण्यतरा मताः।
तासां सङ्ख्यां ब्रुबे विप्राः श्रृणुतादरतोऽखिलम्।9।

इस प्रकार इस पुराण के बारह भेद या खंड हैं। ये बारह संहितायें अत्यन्त पुण्यमयी मानी गयी हैं।9।

विद्येशं दशसहस्त्रं रुद्रं वैनायकं तथा।
औमं मातृपुराणाख्यं प्रत्येकाष्टसहस्त्रकम्।10।

ब्राह्मणो अब मैं उनके श्लोकों की संख्या बता रहा हूँ। आप लोग वह सब आदर पूर्वक सुनें। विद्येश्वरसंहिता में दस हजार श्लोक हैं। रुद्र संहिता, विनायक संहिता, उमा संहिता और मातृ संहिता इनमें प्रत्येक में आठ आठ हजार श्लोक है।10।

त्रयोदशसहस्त्रं हि रुद्रैकादशकं द्विजाः।
षटसहस्त्रं च कैलासं शतरुद्रं तदर्धकम्।11।

कोटिरूद्रं त्रिगुणितमेकादश सहस्त्रकम्।
सहस्त्रकोटि रूद्राख्यमुदितं ग्रन्थसंङ्ख्या12।

वायवीयं खाब्धिशतं धर्मं रवि सहस्त्रकम्।
तदेवं लक्ग्रन्थसंङ्ख्याविभेदितः।13।

ब्राह्मणो एकादशरुद्र संहिता में तेरह हजार, कैलास संहिता में छः हजार, शतरुद्र संहिता में तीन हजार, 
कोटिरुद्र संहिता में ग्यारह हजार, वायवीय संहिता में चार हजार तथा धर्म संहिता में बारह हजार श्लोक है। इस प्रकार मूल शिवपुराण की श्लोक संख्या एक लाख  है।11--12--13।

व्यासेन तत्तु सङक्षिप्तं चतुर्विंशत्सक्षस्त्रकम्।
शैवं तत्र चतुर्थं वै पुराणं ग्रन्थसंङ्ख्या।14।

परंतु व्यास जी ने उसे चौबीस हजार श्लोकों में संक्षिप्त कर दिया है। पुराणों की क्रम संख्या के विचार से इस शिवपुराण का स्थान चौथा है। इसम सात संहिताऐं हैं।

शिवेन कल्पक्षितं पूर्वं पुराणं ग्रन्थसंङ्ख्यया।
शत कोटि प्रमाणं हि पुरा सृष्टौ सुविस्मृतम्।15।

पूर्वकाल में भगवान शिव ने श्लोक संख्या की दृष्टि से सौ करोड़ श्लोकों का एक ही पुराण ग्रन्थ ग्रथित किया था। सृष्टि के आदि में निर्मित हुआ वह पुराण साहित्य अत्यंत विस्तृत था।15।

व्यस्तेष्टादशधा चैव पुराणो द्वापरादिषु।
चतुर्लक्षेण संक्षिप्तेकृतेद्वैपायनादिभिः।16।

फिर द्वापर आदि युगों में द्वैपायन आदि महर्षियों ने जब पुराण का अठारह भागों में विभाजन कर दिया, उस समय सम्पूर्ण पुराणों का संक्षिप्त स्वरूप केवल चार लाख श्लोकों का रह गया।16।

प्रोक्तं शिवपुराणं हिछ चतुर्विंशत्सहस्त्रकम्।
श्लोकानां संख्यया सप्तसंहितं ब्रह्म संम्मितम्।17।

उस समय उन्होंने शिवपुराण का चौबीस हजार श्लोकों में प्रतिपादन किया।यही इसके श्लोकों की संख्या है।यह वेदतुल्य पुराण सात संहिताओं में बंटा हुआ है।17।

 विद्येश्वराख्या तत्राद्यि रौद्री ज्ञेया द्वितीयका।
तृतीया शतरूद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिका।18।

पंचमी चैवमौम्याख्या षष्ठी कैलाशसंज्ञिका।
सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता मताः।19।

इसकी पहली संहिता का नाम  विद्येश्वरसंहिता है। दूसरी रुद्रसंहिता समझनी चाहिये। तीसरी का नाम शतरुद्रसंहिता चौथी का कोटिरुद्रसंहिता, पांचवी का उमासंहिता, छठी का कैलाशसंहिता और सातवीं का नाम वायवीय संहिता है। इस प्रकार ये सात संहिताएं मानी गयीं है।18--19।

ससप्तसंहितं दिव्यं पुराणं शिव संज्ञकम्।
वरीवर्ति ब्रह्मतुल्यं सर्वोपरिगतिप्रदम्।20।

इन सात संहिताओं से युक्त दिव्य शिवपुराण वेद के तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है।
 यह निर्मल शिव पुराण भगवान शिव के द्वारा ही प्रतिपादित है।20।

शैवं पुराणममलं शिवकीर्तितं तद् व्यासेन शैवप्रवणेन च सङ्गृहीतम्।
सङक्षेपतः सकलजीवगुणोपकारं तापत्रयघ्नमतुलं शिवदं सतां हि।21।
  
 इसे शैवशिरोमणि भगवान व्यास ने संक्षेप से संकलित किया है। यह समस्त जीव समुदाय के लिए उपकारक, त्रिविध तापों का नाश करने वाला है।21।

विकैतवो धर्म इह प्रगीतो वेदान्तविज्ञानमयः प्रधानः।
अमत्सरान्तर्बुधवेद्यवस्तु सत्क्लृप्तमंत्रौघत्रिवर्गयुक्तम्।22।

इसमें वेदांत विज्ञानमय, प्रधान तथा निष्कपट धर्म का प्रतिपादन किया गया है। यह पुराण ईर्ष्या रहित अन्तःकरण वाले विद्वानों के लिए जानने की वस्तु है। इसमें श्रेष्ठ मन्त्र समूहों का संकलन है तथा धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्ग की प्राप्ति के साधन का भी वर्णन है।22।

शैवं.पुराणतिलकं खलु सत्पुराणं वेदान्तवेदविलसत्परवस्तुगीतम्।
यो वै पठेच्च श्रृणुयात् परमादरेण शम्भुप्रियः स हि लभेत् परमां गतिं वै।23।

 यह उत्तमम् शिवपुराण समस्त पुराणों में श्रेष्ठ है। वेदवेदांत में वेद्यरुप से विलसित परम् वस्तु परमात्मा का इसमें गान किया गया है।जो बड़े आदर से इसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान शिव का प्रिय होकर परम् गति को प्राप्त कर लेता है।23।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां मुनिप्रश्नोत्तरवर्णनं नाम द्वितीयो अध्यायः।।2।।.

ॐ जय बाबा की ॐ  || बाबा चरणदास || 


श्रीशिवमहापुराणम् - प्रथमा विद्येश्वरसंहिता

श्रीशिवमहापुराणम्
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता - अथ प्रथमोऽध्यायः
|| संकलन- बाबा चरणदास || 

आद्यन्तमंगलमजातसमान भावमार्यं तमीशमजरामरमात्मदेवम्।
पञ्चाननंं प्रबल पञ्चविनोदशीलं सम्भावयेमनसि शंकरमम्बिकेशम्।।

जो आदि और अन्त में तथा मध्य में भी नित्य मंगलमय है, जिनकी समानता अथवा तुलना कहीं भी नहीं है, जो आत्मा के स्वरूप को प्रकाशित करने वाले देवता परमात्मा हैं, जिनके पांच मुख है और जो खेल ही खेल में अनायास जगत की रचना, पालन और संहार तथा अनुग्रह एवं तिरोभाव रूप पांच प्रवल कर्म करते रहते हैं, उन सर्वश्रेष्ठ अजर अमर ईश्वर अम्बिकापति भगवान शंकर का मैं मैन ही मन चिंतन करता हूँ।

व्यास उवाच

धर्मक्षेत्रे महाक्षेत्रे गंगाकालिन्दिसंगमे।
प्रयागे परमे पुण्ये ब्रह्म लोकस्य वर्त्मनि।1।

व्यास जी कहते हैं----
जो धर्म का महान् क्षेत्र है और जहाँ गंगा यमुना का संगम हुआ है, उस परम पुण्यमय प्रयाग में, जो ब्रह्मलोक का मार्ग है।1।

मुनयः शंसितात्मानः सत्यव्रतपरायणाः।
महौजसो महाभागा महासत्रं वितेनिरे।2।

सत्यव्रत में तत्पर रहने वाले महातेजस्वी महाभाग महात्मा मुनियों ने एक विशाल ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया। 2।

तत्र सत्रं समाकार्यं व्यासशिष्यो महामुनिः।
आजगाम मुनीन् द्रष्टुं सूतः पौराणिकोत्तमः।3।

उस ज्ञान यज्ञ का समाचार सुनकर पौराणिक शिरोमणि व्यास शिष्य महामुनि सूत जी वहाँ मुनियों का दर्शन करने के लिए आये।3।

तं दृष्ट्वा सूतमायान्तं हर्षिता मुनयस्तदा।
चेतसा सुप्रसन्नेन पूजां चक्रुर्यथाविधि।4।

सूत जी को आये देख वे सब मुनि उस समय हर्ष से खिल उठे।अत्यन्त प्रसन्नचित्त से उन्होंने उनका विधिवत स्वागत सत्कार किया।4।

ततो विनय संयुक्ताः प्रोचुः साञजलयश्च ते।
सुप्रसन्ना महात्मानः स्तुतिं कृत्वायथाविधि।5।

 तत्पश्चात उन प्रसन्न महात्माओं ने उनकी विधिवत स्तुति करके विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा।5।

रोमहर्षण सर्वज्ञ भवान वै भागय गौरवात्।
पुराण विद्यामखिलां व्यासात् प्रत्यर्थ मीयिवान्।6।

सर्वज्ञ विद्वान रोमहर्षणजी आपका भाग्य बड़ा भारी है, इसी से आपने व्यास जी के मुख से अपनी प्रसन्नता के लिए ही संपूर्ण पुराण विद्या प्राप्त की।6।

तस्मादाश्चर्यभूतानां कथानां त्वं हि भाजनम्।
रत्नानामुरुसाराणां रत्नाकर इवार्णवः।7।

इसलिए आप आश्चर्य स्वरूप कथाओं के भंडार हैं।ठीक उसी तरह, जैसे रत्नाकर समुद्र बड़े बड़े सारभूत रत्नों का आगार है।7।

यच्च भूतं च भव्यं च यच्चान्यद्वस्तु वर्तते।
न त्वयाविदितं किन्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते।8।

तीनों लोकों में भूत, वर्तमान और भविष्य तथा और भी जो कोई वस्तु है, वह आपसे अज्ञात नहीं है।8।

त्वं मद्दिष्टवशादस्य दर्शनार्थ मिहागतः।
कुर्वन् किमपि नः श्रेयो न वृथा गन्तुमर्हसि।9।

आप हमारे सौभाग्य से इस यज्ञ का दर्शन  करने यहां पधार गए हैं। और इसी व्याज से हमारा कुछ कल्याण करने वाले हैं। क्योंकि आपका आगमन निरर्थक नहीं हो सकता।9।
त्वं श्रुतं स्म नः सर्वं पूर्वमेव शुभाशुभम्।न तृप्ति मधिगच्छामः श्रवणेच्छा मुहुर्मुहुः।10।

हमने पहले भी आपसे शुभाशुभ तत्त्व का पूरा पूरा वर्णन सुना है, किन्तु उससे तृप्ति नहीं होती, हमें उसे सुनने की बारम्बार इच्छा होती है।10।

इदानी मेकमेवास्ति श्रोतव्यं सूत सन्मते।
तद्रहस्यमपि ब्रूहि यदि तेअनुग्रहो भवेत।11।

उत्तमम् बुद्धि वाले सूत जी इस समय हमें एक ही बात सुननी है। यदि आपका अनुग्रह हो तो गोपनीय होने पर भी आप उस बिषय का वर्णन करें।11।

प्राप्ते कलियुगे घोरे नराः पुण्य विवर्जिताः।
दुराचाररताः सर्वे सत्यवार्तापराङ्मुखाः।12।
घोर कलियुग आने पर मनुष्य पुण्य कर्म से दूर रहेंगे, दुराचार में फंस जायेंगे और सब के सब सत्य भाषण से मुंह फेर लेंगे।12।

परापवादनिरताः परद्रव्याभिलाषिणः।
परस्त्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः।13।

दूसरों की निंदा में तत्पर होंगे, पराये धन को हड़पने की इच्छा करेंगे।उनका मन परायी स्त्रियों में आशक्त होगा तथा वे दूसरे प्राणियों की हिंसा किया करेंगे।13।
देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः।
मातृपितृकृतद्वेषाः स्त्रीदेवाः कामकिंकराः।14।

अपने शरीर को ही आत्मा समझेंगे। मूढ, नास्तिक और पशुबुद्धि रखने वाले होंगे, मातापिता से द्वेष रखेंगे।14।

विप्रा लोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः।
धनार्जनार्थमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः।15।

ब्राह्मण लोभरूपी ग्रह के ग्रास बन जाएंगे। वेद बेचकर जीविका चलायेंगे।धन का उपार्जन करने के लिए ही विद्या का अभ्यास करेंगे। और मद से मोहित रहेंगे।15।

त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परवञ्चकाः।
त्रिकालसन्ध्यया हीना ब्रह्मबोधविवर्जिताः।16।

अपनी जाति के कर्म छोड़ देंगे। प्रायः दूसरों को ठगेंगे, तीनों काल की संध्योपासना से दूर रहेंगे और ब्रह्मज्ञान से शून्य होंगे।16।

क्षत्रियाश्च तथा सर्वे स्वधर्मत्यागशीलिनः।
असत्संगाः पापरता व्यभिचार परायणाः।17।

समस्त क्षत्रिय भी स्वधर्म का त्याग करने वाले होंगे। कुसंगी , पापी और व्यभिचारी होंगे।17।

अशूरा अरणप्रीताः पलायनपरायणाः।
कुचौरवृत्तयः शूद्राः कामकिंकरचेतसः।18।

उनमें शौर्य का अभाव होगा । वे कुत्सित शौर्य कर्म से जीविका चलायेंगे, शुद्रों का सा बर्ताव करेंगे और उनका चित्त काम का किंकर बना रहेगा।18।

वैश्याः संस्कारहीनास्ते स्वधर्मत्यागशीलिनः।
कुपथाः स्वार्जनरतास्तुलाकर्मकुवृत्तयः।19।

वैश्य संस्कार भ्रष्ट, स्वधर्म त्यागी,कुमार्गी, धनोपार्जन परायण तथा नाप तोल में अपनी कुत्सित वृत्ति का परिचय देने वाले होंगे।19।
तद्वच्छूद्राश्च ये केचिद ब्राह्मणाचारतत्पराः।
उज्ज्वलाकृतयो मूढाः स्वधर्मत्यागशीलिनः।20।

इसी तरह शूद्र ब्राह्मणों के आचार में तत्पर होंगे, उनकी आकृति उज्ज्वल होगी अर्थात वे अपना कर्म धर्म छोड़कर उज्ज्वल वेशभूषा से विभूषित हो व्यर्थ। घूमेंगे। वे स्वभावतः ही अपने धर्म का त्याग करने वाले होंगे, 20। 

धनवन्तः कुकर्माणो विद्यावन्तोविवादिनः।
आख्यानोपासनाधर्मवक्तारो धर्मलोपकाः।21।

उनके विचार धर्म के प्रतिकूल होंगे। वे कुटिल और द्विज निंदक होंगे। यद्य धनी हुए तो कुकर्म में लग जाएंगे। विद्वान हुए तो वाद विवाद करने वाले होंगे।21।

सुकुलीनान्निजान मत्वा चतुर्वर्णैर्विवर्तनाः।
सर्ववर्णभ्रष्टकराः मूढाः सत्कर्मकारिणः।22।

अपने को कुलीन मानकर चारों वर्णों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करेंगे, समस्त वर्णों को अपने सम्पर्क से भ्रस्ट करेंगे। वे लोग अपनी अधिकार सीमा से बाहर जाकर द्विजोचित सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाले होंगे।22।

स्त्रियश्चप्रायशो भ्रष्टा भर्त्रवज्ञानकारिकाः।
श्वशुरद्रोहकारिण्यो निर्भया मलिनाशनाः।23।

कलयुग की स्त्रियां प्रायः सदाचार  से भ्रष्ट और पति का अपमान करने वाली होंगी। सास ससुर से द्रोह करेंगी। किसी से भय नही मानेंगी। मलिन भोजन करेंगी।23।

कुहावभावनिरताः कुशीलाः स्मरविह्वलाः।
जारसंगरता नित्यं स्वस्वामिविमुखास्तथा।24।

कुत्सित हाव भाव में तत्पर होंगी। उनका शील स्वभाव बहुत बुरा होगा और वे अपने पति की सेवा से सदा ही विमुख रहेंगी।24।

एतेषां नष्ट बुद्धीनां स्वधर्मत्यागशीलिनाम्।
परलोकेऽपीह लोके कथं सूत गतिर्भवेत।25।

सूतजी इस तरह जिनकी बुद्धि नष्ट हो गयी है, जिन्होंने अपने धर्म का त्याग कर दिया है ऐसे लोगों को इहलोक और परलोक में उत्तम् गति कैसे प्राप्त होगी।25।

इति चिन्ताकुलं चित्तं जायते सततं हि नः।
परोपकार सदृशो नास्ति धर्मोऽपरः खलु।26।

इसी चिंता से हमारा मन सदा व्याकुल रहता है। परोपकार के समान दूसरा कोई धर्म नहीं है।26।

लघुपायेन येनैषां भवेत् सद्योऽघनाशनम्।
सर्वसिद्धान्त वित्वं हि कृपया तद्वदाधुना।27।

अतः जिस छोटे से उपाय से इन सबके पापों का तत्काल नाश हो जाय, उसे इस समय कृपा पूर्वक बताइये, क्योंकि आप समस्त सिद्धांतों के ज्ञाता हैं।27।

व्यास उवाच

इत्याकर्ण्यंं वचस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्।
मनसा शंकरं स्मृत्वा सूतः प्रोवाच तान् मुनीन्।28।

व्यास जी कहते हैं

उन भावितात्मा मुनियों की यह बात सुनकर सूतजी मन ही मन भगवान शंकर का स्मरण करके उनसे इस प्रकार बोले।28।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां मुनिप्रश्नवर्णनं नाम प्रथमोअध्यायः।।1।।

|| संकलन- बाबा चरणदास || 

श्रीशिवपुराण माहात्म्य - अथ पंचमोअध्याय

श्रीशिवपुराण माहात्म्य -   अथ पंचमोअध्याय
मूलपाठ एवं हिन्दी व्याख्या
संकलन - बाबा चरणदास 
सूत उवाच

सा कदाचिदुमा देवी मुपगम्य प्रणम्य च।
सुतुष्टाव करौ बद्ध्वा परमानन्दसम्प्लुता।1।

सूतजी बोले ----

 शौनक एक दिन परमानन्द मैं निमग्न हुई चञ्चुला ने उमादेवी के पास जाकर प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर वह उनकी स्तुति करने लगी।1।

चञ्चुलोवाच

गिरिजे स्कन्दमातस्त्वं सेविता सर्वदा नरः।
सर्व सौख्यप्रदे शम्भुप्रिये ब्रह्मस्वरूपिणि।2।

चञ्चुला बोली---
गिरिराज नन्दिनी स्कन्दमाता उमे मनुष्यों ने सदा आपका सेवन किया है। समस्त सुखों को देने वाली शम्भुप्रिये आप ब्रह्मस्वरुपिणी हैं।2।

विष्णुब्रह्मादिभिस्सेव्यासगुणा निर्गुणापि च।
त्वमाद्या प्रकृति स्सूक्ष्मा सच्चिदानन्द रूपिणी।3।
विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा सेव्य हैं।आप ही सगुणा और निर्गुणा है तथा आप ही सूक्ष्म सच्चिदानन्द स्वरूपिणी आद्या प्रकृति हैं।3।

सृष्टि स्थितिलक्षयकरी त्रिगुणा त्रिसुरालया।
ब्रह्मविष्णु महेशानां सुप्रतिष्ठाकरा परा।4।
आप ही संसार की सृष्टि, पालन और संहार करने वाली हैं। तीनों गुणों का आश्रय भी आप ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इन तीनों देवताओं का आवास स्थान और उनकी उत्तम प्रतिष्ठा कराने वाली परा शक्ति आप ही है।4।

सूत उवाच

इति स्तुत्वामहेशीं तां चञ्चुला प्राप्त सद्गतिः।
विरराम नतस्कन्धा प्रेमपूर्णा श्रुलोचना।5।
सूतजी कहते हैं

शौनक जिसे सद्गति प्राप्त हो चुकी थी, वह चंचुला इस प्रकार महेश्वर पत्नी उमा की स्तुति करके सिर झुकाए चुप हो गयी। उसके नेत्रों में प्रेम के आँसू उमड़ आये थे।5।

ततः सा करुणाविष्टा पार्वतही शंकरप्रिया।
तामुवाच महाप्रीत्या चञ्चुलां भक्त वत्सला।6।
तब करुणा से भरी हुयी शंकरप्रिया भक्तबत्सला पार्वती देवी ने चंचुला को  सम्बोधित करके. बड़े प्रेम से इस प्रकार कहा।6।

पार्वत्युवाच

चञ्चुले सखि सुप्रीतानया स्तुत्यास्मि सुन्दरि। 
किं याचसे बरं ब्रूहि नादेयं विद्यते तव।7।
 पार्वती बोलीं-----

सखी चञ्चुले सुन्दरि मैं तुम्हारी की हुयी स्तुति से बहुत प्रसन्न हूँ।बोलो क्या वर माँगती हो, तुम्हारे लिए मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।7।

इत्युक्ता सा गिरिजया चञ्चुला सुप्रणम्य ताम।
पर्यपृच्छत सुप्रीत्या साञ्जलिर्नतमस्तका।8।
पार्वती जी की बात सुनकर चञ्चुला ने हाथ जोड़े औऱ प्रणाम पूर्वक सिर झुकाकर उनसे प्रश्न किया।8।

चञ्चुलोवाच
मम भर्ताधुना क्वास्ते नैव जानामि तद्गतिम्। 
तेन युक्ता यथाहं वै भवामि गिरिजे अनघे।9।
चञ्चुलोवाच

निष्पाप गिरिराज कुमारी मेरे पति बिन्दुग इस समय कहाँ है, उनकी कैसी गति हुई है यह मैं नहीं जानती ,कल्याण मयी दीन वत्सले मैं अपने उन पतिदेव से जिस प्रकार संयुक्त हो सकूँँ वैसा ही उपाय कीजिये।9।

तथैव कुरु कल्याणि कृपया दीनवत्सले।
महादेवि महेशानि भर्ता मे वृषलीपतिः।
मत्तः पूर्वं मृतः पापमी न जाने कां गतिं गतः।10।
माहेश्वरि महादेवी मेरे पति एक शूद्र जातीय वेश्या के प्रति आसक्त थे और पाप में ही डूबे रहते थे उनकी मृत्यु मुझसे पहले ही हो गयी थी। न जाने वो किस गति को प्राप्त हुए।10।

गिरिजोवाच
सुते भर्ता बिन्दुगाह्वो महापापी दुराशयः।
वेश्याभोगी महामूढ़़ो मृत्वा स नरकं गतः।11।
गिरिजा बोलीं

बेटी तुम्हारा बिन्दुग नाम वाला पति बड़ा पापी था।उसका अन्तः करण बड़ा ही दूषित था। वेश्या का उपभोग करने वाला वह महामूढ़ मरने के बाद नरक में पड़ा।11।

भुक्त्वा नरकदुःखानि विविधान्यमिताः समाः।
पापशेषेण पापात्मा विन्ध्ये जातः पिशाचकः।12।
अगणित वर्षों तक नरक मैं नाना प्रकार के दुःख भोगकर वह पापात्मा अपने शेष पाप को भोगने के लिये विन्ध्यपर्वत पर पिशाच हुआ है।12।

इदानीं स पिशाचोस्ति नानाक्लेश समन्वितः।
तत्रैव वातभुग्दुष्टः सर्वकष्टवहः सदा।13।
इस समय वह पिशाच अवस्था में ही है और नाना प्रकार के क्लेश उठा रहा है। वह दुष्ट वहीं वायु पीकर रहता है और सदा सब प्रकार के कष्ट सहता है।13।

सूत उवाच

इति गौर्या वचः श्रुत्वा चञ्चुला सा शुभव्रता।
पति दुःखेन महता दुःखिता सीत्तदा किल।14।
सूत जी कहते हैं ---- शौनक गौरी देवी की यह बात सुनकर उत्तम व्रत का पालन करने वाली  चञ्चुला उस समय पति के महान दुःख से दुःखी हो गयी।14।

समाधाय ततश्चित्तं सुप्रणम्य महेश्वरीम।
पुनः पप्रच्छ सा नारी हृदयेन विदूयता।15।
फिर मन को स्थिर करके उस ब्राह्मण पत्नी ने व्यथित हृदय से माहेश्वरि को प्रणाम करके पुनः पूछा।15।

महेश्वरी महिदेवि  मुझ पर कृपा कीजिये और दूषित कर्म करनेवाले मेरे उस दुष्ट पति का अब उद्बार कर दीजिये।16।

महेश्वरी महादेवि कृपां कुरु ममौपरि।
समुद्धार पतिं मे अद्य दुष्ट कमकं खलम्।16।
केनोपायेन मे भर्ता पापात्मा स कुबुद्धिमान ।
सद्गति प्राप्नुयाद्देवि तद्वदाशु नमोस्तुते।17।
देवि कुत्सित बुद्बि वाले मेरे उस पापात्मा पति को किस उपाय से उत्तम गति प्राप्त हो सकती है शीघ्र बताइये। आपको नमस्कार है।17।

 श्रृणुयाद्यदि ते भर्ता पुण्यां शिवकथा पराम्।
निस्तीर्यं दुर्गति सर्वा सद्गतिं प्राप्नुयादिति।18।
पार्वती ने कहा ---- यदि तुम्हारा पति  शिवपुराण की पुण्यमयी उत्तम कथा सुने तो सारी दुर्गति को पार करके वह उत्तम गति का भागी बन सकता है।18।
 इति गौर्या वचःश्रुत्वा मृताक्षर मथादरात्।
कृताञजलिर्नतस्कथा प्रणनाम पुनःपुनः।19।
अमृत के समान मधुर अक्षरों से युक्त गौरीदैवी का यह वचन आदर पूर्वक सुनकर चंचुला ने हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया।19।

तत्कथा श्रवणं भर्तुः सर्वपापविशुद्धये।
सद्गति प्राप्तये चैव प्रार्थयामास तां तदा।20।
और अपने पति के समस्त पापों की शुद्धि तथा उत्तम गति की प्राप्ति के लिये पार्वती देवी से यह प्रार्थना  की कि मेरे पति को शिवपुराण सुनाने की व्यवस्था होनी चाहिये।20।
तया मुहुर्मुहुर्नार्या प्रार्थ्यमाना शिवप्रिया।
गौरी कृपान्वितासीत् सा महेशी भक्तबत्सला।21।
उस ब्राह्मण पत्नी के बारंबार प्रार्थना करने पर शिवप्रिया ग़ौरी दैवी को बड़ी दया आयी।21।

अथ तुम्बरूमाहूय शिवसत्कीर्तिगायकम्।
प्रीत्या गन्धर्वराजं हि गिरिकन्येदमब्रबीत्।22।
 उन भक्तबत्सला महेश्वरि गिरिराजकुमारी ने भगवान शिव की उत्तम कीर्ति का गान  करने वाले गन्धर्वराज तुम्बरू को बुलाकर उनसे प्रसन्नता पूर्वक इस प्रकार कहा।22।

गिरिजोवाच

हे तुम्बुरो शिवप्रीत मम मानसकारक।
सहानया विन्ध्यशैलं भद्रं ते गच्छ सत्वरम्।23।
गिरिजोवाच
तुम्बुरो तुम्हारी भगवान शिव में प्रीति है। तुम मेरे मन की बातों को जानकर मेरे अभीष्ट कार्यों को सिद्ध करने वाले हो। इसलिए मैं तुमसे एक बात कहती हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी इस सखी के साथ शीघ्र ही विन्ध्यपर्वत पर जाओ।23।

आस्ते तत्र महाघोरः पिशाचो अतिभयंकरः।
तदवृत्तं श्रृणु सुप्रीत्यादितः सर्वं ब्रवीमि ते।24।
वहाँ एक महाघोर और भयंकर पिशाच रहता है। उसका वृत्तांत तुम आरम्भ से ही सुनो । मैं तुमसे प्रसन्नता पूर्वक सब कुछ बताती हूँ।24।

पुराभवे पिशाचः स बिन्दुगाह्वोभवद् द्विजः।
अस्या नार्याः पतिर्दुष्टो मत्सख्या वृषलीपतिः।25।
पूर्व जन्म में वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था।मेरी इस सखी चंचुला का पति था। परन्तु वह दुष्ट वेश्यागामी हो गया।25।
स्नान संध्या क्रियाहीनोशौचः क्रोध विमूढधीः।
दुर्भक्षी सज्जन द्वेषी दुष्परिग्रहकारकः।26।
वह  स्नान, संध्या आदि नित्य कर्म छोड़कर अपवित्र रहने लगा।क्रोध के कारण उसकी बुद्धि पर मूढ़ता छा गयी थी।वह कर्तव्याकर्तव्य का विवेक नहीं कर पाता था। अभक्ष्य भक्षण, सज्जनों से द्वेष और दूषित बस्तुओं का दान लेना यही उसका स्वाभाविक कर्म बन गया था। 26।

हिंसकः शस्त्रधारी च सव्यहस्तेन भोजनी।
दीनानां पीडकः क्रूरः परवेश्मप्रदीपकः।27।
वह अस्त्र शस्त्र लेकर हिंसा करता, बाएं हाथ से खाता, दीनों को सताता और क्रूरता पूर्वक पराये घरों में आग लगा देता था।27।

चाण्डालाभिरतो नित्यं वेश्याभोगी महाखलः।
स्वपत्नीत्यागकृत पापी दुष्ट संगरतस्तदा।28।
चांडालों से प्रेम करता और प्रतिदिन वेश्या के संपर्क में रहता था। बड़ा दुष्ट था। वह पापी अपनी पत्नी का परित्याग करके दुष्टों के संग में ही आनंद मनाता था।28।

आमृत्योः स दुराचारी कालेन निधनं गतः।
ययौ यमपुरं घोरं भोगस्थानं हि पापिनाम्।29।
वह मृत्युपर्यन्त दुराचार में ही फँसा रहा। फिर अंतकाल आने पर उसकी मृत्यु हो गयी
वह पापियों के भोगस्थान घोर यमपुर में गया।29।

तत्र भुक्त्वा स दुष्टात्मा नरकानि बहूनि च।
इदानीं स पिशाचोस्ति विन्ध्येद्रौ पापभुक् खलः।30।
और वहां बहुत से नरकों का उपभोग करके वह दुष्टात्मा जीव इस समय विंध्य पर्वत पर पिशाच बना हुआ है।30।

तस्याग्रे परमां पुण्यां सर्वपापविनाशिनीम्।
दिवयां शिवपुराणस्य कथां कथय यत्नतः।31।
वहीं वह दुष्ट अपने पापों का फल भोग रहा है। तुम उसके आगे यत्न पूर्वक शिवपुराण की उस दिव्य कथा का प्रवचन करो। जो परम् पुण्यमयी तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है।31।

द्रुतं शिवपुराणस्य कथाश्रवणतः परात्।
सर्वपापविशुद्धात्मा हास्यति प्रेततां च सः।32।
शिवपुराण की कथा का श्रवण सबसे उत्कृष्ट पुण्यकर्म है। उससे उसका हृदय शीघ्र ही समस्त पापों से शुद्ध हो जाएगा और वह प्रेतयोनि का परित्याग कर देगा।32।

मुक्तं च दुर्गतेस्तं वै बिन्दुगं त्वं पिशाचकम्।
मदाज्ञया विमानेन समानय शिवान्तिकम्।33।
उस दुर्गति से मुक्त होने पर बिन्दुग नामक पिशाच को मेरी आज्ञा से विमान पर बिठाकर तुम भगवान शिव समीप ले आओ।33।

सूत उवाच

इत्यादिष्टो महेशान्या गन्धर्वेन्द्रश्च तुम्बरूः।
मुमुदेऽतीव मनसि भाग्यं निजमवर्णयत्।34।
सूत जी कहते हैं---

शौनक ! महेश्वरि उमा के इस प्रकार आदेश देने पर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने भाग्य की सराहना की।34।

आरुह्य सुविमानं स सत्या तत्प्रियया सह।
ययौ विन्ध्याचले सोऽरं यत्रास्ते नारदप्रियः।35।
तत्पश्चात उस पिशाच की सती साध्वी पत्नी चञ्चुला के साथ विमान पर बैठकर नारद के प्रिय मित्र तुम्बुरू वेगपूर्वक विंध्याचल पर्वत पर गये, जहाँ वह पिशाच रहता था।35।
तत्रापश्यत् पिशाचं तं महाकायं महाहनुम्।
प्रहसन्तं रुदन्तं च वल्गन्तं विकटाकृतिम्।36।
वहां उन्होंने उस पिशाच को देखा। उसका शरीर विशाल था। ठोड़ी बहुत बड़ी थी। वह कभी हँसता, कभी रोता और कभी उछलता था। उसकी आकृति बड़ी विकराल थी।36।
बलाज्जग्राह तं पाशैः पिशाचं चातिभीकरम्।
तुम्बरूश्शिवकीर्तिगायकश्च महाबलली।37।
भगवान शिव की उत्तम कीर्ति का गान करने वाले महाबली तुम्बुरू ने उस अत्यन्त भयंकर पिशाच को पाशों द्वारा बाँध लिया।37।
अथो शिवपुराणस्य वाचनार्थं स तुम्बरुः।
निश्चित्य रचनां चक्रेमहोत्सवसमन्विताम्।38।
तदनंतर तुम्बुरू ने शिवपुराण की कथा बाँचने का निश्चय करके महोत्सव युक्त स्थान और मंडप आदि की रचना की।38
पिशाचं तारितुं देव्याः शाशनात्तुम्बुरुर्गतः।
विन्ध्यं शिवपुराणं स ह्यद्रिं श्रावयितुं परम्।39।
इतने में ही सम्पूर्ण लोकों में बड़े वेग से यह प्रचार हो गया कि देवी पार्वती की आज्ञा से एक पिशाच का उद्धार करने के उद्देश्य से शिवपुराण की उत्तम कथा सुनाने के लिये तुम्बुरु विन्ध्यपर्वत पर गये हैं।39।
इति कोलाहलो जातः सर्वलोकेषु वै महान्।
तत्र तच्छृवणार्थाय ययुर्देवर्षयो द्रुतम् ।40।

फिर तो उस कथा को सुनने के लोभ से बहुत से देवर्षि भी शीघ्र ही वहां जा पहुँचे।40।
समाजस्तत्र परमोऽद्भुतश्चासीच्छुभावः।
तेषां शिवपुराणस्यागतानां श्रोतुमादरात्।41।

आदर पूर्वक शिवपुराण सुनने के लिये आये हुए लोगों का उस पर्वत पर बड़ा अद्भुत और कल्याणकारी समाज जुट गया।41।
पिशाचमथ तं पाशैर्बद्ध्वा समुपवेस्य च।
तुम्बरुर्वल्लकीहस्तो जगौ गौरीपतेः कथाम्।42।
फिर तुम्बुरू ने उस पिशाच को पाशों से बांधकर आसन पर बिठाया और हाथ मे वीणा लेकर गौरीपति की कथा का गान आरम्भ किया।42
आरभ्य संहितामाद्यां सप्तमी संहितावधि।
स्पष्टं शिवपुराणं हि समाहात्यं समावदत्।43।
पहली अर्थात विद्येश्वर संहिता से लेकर सातवीं वायुसंहिता तक माहात्म्य सहित शिवपुराण की कथा का उन्होने स्पष्ट वर्णन किया।43।
श्रुत्वा शिवपुराणं तु सप्तसंहितमादरात।
बभूवुः सुकृतार्थास्ते सर्वे श्रोतार एव हि।44।
सातों संहिताओं सहित  शिवपुराण का आदरपूर्वक श्रवण करके वे सभी श्रोता पूर्णतः कृतार्थ हो गये।44।
स पिशाचो महापुण्यं श्रुत्वा शिवपुराणकं।
विधूय कलुषं सर्वं जहौ पैशाचिकं वपुः।45।
उस परम पुण्यमय शिवपुराण को सुनकर उस पिशाच ने अपने सारे पापों को धोकर उस पैशाचिक शरीर को त्याग  दिया।45।
दिव्य रुपो बभूवाशु गौरवर्णः सितांशुकः।
सर्वालंकार दीप्तांगस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः।46।
फिर तो शीघ्र ही उसका दिव्य रूप हो गया। अंगकान्ति गौरवर्ण की हो गयी। शरीर पर श्वेत वस्त्र तथा सब प्रकार के पुरुषोचित आभूषण उसके अंगों को उद्भासित करने लगे। वह त्रिनेत्रधारी चंद्रशेखर रूप हो गया।46।
दिव्यं दिव्यवपुर्भूत्वा तया स निजकान्तया।
जगौ स्वयमपि श्रीमांश्चरितं पार्वतीपतेः।47।
इस प्रकार दिव्यदेहधारी होकर श्रीमान बिन्दुग अपनी प्राणबल्लभा चञ्चुला के साथ स्वयं भी पार्वती बल्लभ भगवान शिव का गुणगान करने लगा।47।
तद्वधूमिति सन्दृष्ट्वा सर्वे देवर्षयश्च ते।
बभूवुर्विस्मिताश्चित्ते परमानन्दसंयुताः।48।
उसकी स्त्री को इस प्रकार दिव्य रूप से सुशोभित देख वे सभी देवर्षि बड़े विस्मित हुए। उनका चित्त परमानन्द से परिपूर्ण हो गया।48।
सुकृतार्था महेशस्य श्रुत्वा चरितमद्भुतम्।
स्वं स्वं धाम ययुः प्रीत्या शंसन्तः शांकरंं यशः।49।
भगवान महेश्वर का वह अद्भुत चरित्र सुनकर वे सभी श्रोता परम कृतार्थ हो प्रेमपूर्वक श्रीशिव का यशोगान करते हुए अपने अपने धाम को चले गए।49।
बिन्दुगः सोऽपि दिव्यात्मासुविमानस्थितः सुखी।
स्वकान्तापार्श्वगः श्रीमाञ्छुशुभेऽतीव खस्थितः।50।
दिव्य रूपधारी श्रीमान बिन्दुग भी सुंदर विमान पर अपनी प्रियतमा के पास बैठकर सुखपूर्वक आकाश में स्थित हो बड़ी शोभा पाने लगा।50।
अथ गायन महेशस्य सुगुणान् सुमनोहरान्।
सतुम्बुरूर्जगामाशु सकान्तः शांकरं पदम्।51।
तदनंतर महेश्वर के सुंदर एवं मनोहर गुणों का गान करता हुआ वह अपनी प्रियतमा तथा  तुम्बुरु के साथ शीघ्र ही शिवधाम में जा पहुंचा।51।
सुसत्कृतो महेशेन पार्वत्या च स बिन्दुगः।
स्वगणश्च कृतः प्रीत्या साभवद्गिरिजासखी।52।
वहां भगवान महेश्वर तथा पार्वती देवी ने प्रसन्नतापूर्वक बिन्दुग का बड़ा सत्कार किया और उसे अपना पार्षद बना लिया उसकी पत्नी चञ्चुला पार्वती जी की सखी हो गयी।52।
तस्मिँल्लोके परानन्दे घनज्योतिषिशाश्वते।
लव्ध्वा निवासमचलं लभेते परमं सुखम्।53।
उस घनीभूत ज्योतिःस्वरूप परमानन्दमय सनातनधाम में अवविचल निवास पाकर वे दोनों दम्पति परम सुखी हो गए।53।

इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराण माहात्म्ये बिन्दुगसद्गतिवर्णनं नाम पंचमो अध्यायः।।5।।

ॐ जय बाबा की ॐ || बाबा चरणदास || 

श्रीशिवपुराण माहात्म्य - अथ चतुर्थोअध्याय

श्रीशिवपुराण माहात्म्य
  अथ चतुर्थोअध्याय
मूलपाठ एवं हिन्दी व्याख्या
||  संकलन - बाबा चरणदास || 
दिष्टया काले प्रबुद्धासि शिवानुग्रहतोवराम्।
इमां शिवपुराणस्य श्रुत्वा वैराग्य वत्कथाम्।1।

ब्राह्मण बोले- नारी सौभाग्य की बात है कि भगवान शंकर की कृपा से शिवपुराण की इस वैराग्य युक्त कथा को सुनकर तुम्हें समय पर चेत हो गया है।1।

मा भैषीर्द्विज पत्नि त्वं शिवस्य शरणं व्रज।
शिवानुग्रहतः सर्वं पापं सद्यो विनश्यति।2।

ब्राह्मण पत्नी तुम डरो मत। भगवान शिव की शरण मैं जाओ। शिव की कृपा से सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।2।

वक्ष्यामि ते परमं वस्तु शिवकीर्तिसमन्वितम्।
भविष्यति गतिर्येन सर्वदा ते सुखावहा।3।

मैं तुमसे भगवान शिव की कीर्ति कथा से युक्त उस परम वस्तु का वर्णन करुंगा, जिससे तुम्हें सदा सुख देने वाली उत्तम गति प्राप्त होगी।3।

सत्कथा श्रवणादेव जाता ते मतिरी दृशी।
पश्चात्तापान्विता शुद्धा वैराग्यंं विषयेषु च।4।

शिव की उत्तम कथा सुनने से ही तुम्हारी बुद्धि इस तरह पश्चात्ताप से युक्त एवं शुध्द हो गई है। साथ ही तुम्हारे मन में विषयों के प्रति वैराग्य हो गया है।4।

पश्चात्तापः पापकृतां पापानां निष्कृतिः परा।
सर्वेषां वर्णितं सद्धिः सर्व पापविशोधनम्।5।

पश्चात्ताप ही पाप करने वाले पापियों के लिये सबसे बड़ा प्रायश्चित है। सत्पुरुषों ने सबके लिये प्रायश्चित को ही समस्त पापों का शोधक बताया है।5।

पश्चात्तापेनैव शुद्धिः प्रायश्चितं करोति सः।
यथौपदिष्टं सद्धिर्हि सर्वपापविशोधनम्।6।

पश्चात्ताप से ही पापों की शुद्धि होती है। जो पश्चात्ताप करता है, वही वास्तव में पापों का प्रायश्चित्त करता है, क्योंकि सत्पुरुषों ने समस्त पापों की शुद्धि के लिये जैसे प्रायश्चित का उपदेश किया है, वह सब पश्चात्ताप से सम्पन्न हो जाता है।6।

प्रायश्चित्तमधीकृत्य विधिवन्निर्भयः पुमान्।
न याति सुगतिं प्रायः पश्चात्ताापी न संशयः।7।

जो पुरूष विधिपूर्वक प्रायश्चित करके निर्भय हो जाता है। पर अपने कुकर्म के लिए पश्चाताप नहीं करता, उसे प्रायः उत्तम गति नहीं प्राप्त होती। परंतु जिसे अपने कुकृत्य पर हार्दिक पश्चात्ताप होता है, वह अवश्य उत्तम गति का भागी होता है।7।

एतच्छिवपुराणस्य कथा श्रवणतो यथा।
जायते चित्त शुद्धिर्हि न तथान्यैरुपायतः।8।

इस शिवपुराण की कथा सुनने से जैसी चित्त शुद्धि होती है, वैसी दूसरे उपायों से नहीं होती।8।

शोध्यमानं दर्पणं हि यथा भवति निर्मलम्।
तथैतत्कथया चेतो विशुद्धिं यात्यसंशयम्।9।

जैसे दर्पण साफ करने पर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार इस शिवपुराण की कथा से चित्त अत्यंत शुद्ब हो जाता है। इसमें संशय नहीं है।9।

विशुद्धे चेतसि शिवो नृणां तिष्ठति साम्बिकः।
ततो याति विशुद्धात्मा साम्बशम्भोः परं पदम्।10।

मनुष्यों के शुध्द चित्त मैं जगदम्बा पार्वती सहित भगवान शिव विराजमान रहते हैं। इससे वह विशुद्बात्मा पुरूष श्रीसाम्ब सदाशिव के पद को प्राप्त होता है।10।

सर्वेषां श्रेयसां बीजं सत्कथा श्रवणंं नृणाम्।
यथावर्त्म समाराध्यं भवबन्धगदापहम्।11।

इस उत्तम कथा का श्रवण समस्त मनुष्यों के लिये कल्याण का बीज है। अतः शास्त्रोक्त मार्ग से इसकी आराधना अथवा सेवा करनी चाहिए। यह भवबन्धन रूपी रोग का नाश करने वाली है ।11।

कथाश्रवणतः शम्भोर्मननाच्च ततो ह्रदा।
निदिध्यासनतश्चैव चित्तशुद्धिर्भवत्यलम्।12।

भगवान शिव की कथा को सुनकर फिर अपने ह्रदय मैं उसका मनन एवं निदिध्यासन करना चाहिए। इससे पूर्णतया चित्त शुद्धि हो जाती है।12।

अतो भक्तिर्महेशस्य पुत्राभ्यां भवति ध्रुवम।
 यदनुग्रहतो दिव्या ततो मुक्तिर्न संशयः।13।

चित्त शुद्धि होने से महेश्वर की भक्ति अपने दोनों पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ निश्चय ही प्रकट होती है।तत्पश्चात महेश्वर के अनुग्रह से दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है।13।

तद्विहीनः पशुर्ज्ञेयो माया बन्धन सक्तधीः।
संसार बन्धनान्नैव मुक्तो भवति स ध्रुवम्।14।

जो मुक्ति से वंचित हैं, उसे पशु समझना चाहिए, क्योंकि उसका चित्त माया के बन्धन मैं आसक्त है।वह निश्चय ही संसार बंधन से मुक्त नहीं हो पाता।14।

अतो हि द्विज पत्नि त्वं विषयेभ्यो निवृत्तधीः।
श्रृणु शम्भोः कथां चैतां भक्त्या परम पावनीम्।15।

ब्राह्मण पत्नी इसलिये तुम विषयों से मन को हटालो। और भक्तिभाव से भगवान शंकर की इस परम पावन कथा को सुनो।15।

श्रृण्वन्त्याः सत्कथामेतां शंकरस्य परात्मनः।
शुद्धिमेष्यति चेतस्तेततो मुक्तिम वाप्स्यसि।16।

परमात्मा शंकर की इस. कथा को सुनने से तुम्हारे चित्त की शुद्धि होगी औऱ इससे तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी।16।

ध्यायतः शिवपादाब्जं चैतसा निर्मलेन वै।
एकेन जन्मना मुक्तिः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।17।

जो निर्मल चित्त से भगवान शिव के चरणारविन्दों का चिन्तन करता है, उसकी एक ही जन्म मैं मुक्ति हो जाती है यह मै तुमसे सत्य सत्य कहता हूँ।17।

 इत्युक्त्वा स द्बिजवरो वरः शैवः कृपार्द्रधीः।
तूष्णीं बभूव शुद्धात्मा शिवध्यानपरायणः।18।

सूत जी कहते हैं शौनक  इतना कहकर वे श्रेष्ठ शिवभक्त ब्राह्मण चुप हो गये।  उनका ह्रृदय करूणा से आद्र हो गया था। वे शुध्दचित्त महात्मा भगवान शिव के ध्यान मैं मग्न हो गये।18।

अथ बिन्दुगपत्नी सा चञ्चुलाह्व प्रसन्न धीः।
इत्युक्ता तेन विप्रेण समासीद् बाष्पलोचना।19।

तदनन्तर बिन्दुग की पत्नी चञ्चुला मन ही मन प्रसन्न हो उठी। ब्राह्मण का उक्त उपदेश सुनकर उसके नेत्रों मैं आनंद के आँसू छलक आये थे।19।

पपातारं द्विजेन्द्रस्य पादयोस्तस्य हृष्टधीः।
चञ्चुला साञ्जलिः सा च कृतार्थास्मीत्यभाषत।20।

वह ब्राह्मण पत्नी चञ्चुला हर्ष भरे हृदय से उन श्रेष्ठ ब्राह्मण के दोनों चरणों मे गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली  मैं कृतार्थ हो गयी।20।

अथ सोत्थाय सातंका साञ्जलिर्गद्गदाक्षरम्।
तमुवाच महाशैवं द्विजम् वैराग्ययुक् सुधीः।21।

तत्पश्चात उठकर वैराग्ययुक्त उत्तम बुद्बि वाली। वह स्त्री जो अपने पापों के कारण आतंकित थी, उन महान शिव भक्त ब्राह्मण से हाथ जोड़कर गद्गद वाणी मे बोली।21।

ब्रह्मन शैववर स्वामिन् धन्यस्तवं परमार्थ दृक।
परोपकार निरतो वर्णनीयः सुसाधुषु।22।

चञ्चुला ने कहा  ब्रह्मन शिवभक्तों मे श्रेष्ठ स्वामिन आप धन्य हैं।परमार्थ दर्शी है और सदा परोपकार मैं लगे रहते हैं इसलिए श्रेष्ठ साधु पुरूषोंमैं प्रशंसा के योग्य हैं।22।

उद्धरोद्धर मां साधो पतन्ती नरकार्णवे।
श्रुत्वा यां सुकथां शैवीं पुराणार्थ विजृम्भिताम्।23।
*विरक्त धीरहं जाता विषयेभ्यश्च सर्वतः।
सुश्रद्धा महती ह्योपुराणश्रवणेधुना।24।

साधो मै नरक के समुद्र मैं गिर रही हूँ। आप मेरा उद्धार कीजिए, उद्धार कीजिये। पौराणिक अर्थतत्व से सम्पन्न जिस सुन्दर शिवपुराण की कथा को सुनकर मेरे मन मैं सम्पूर्ण विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो गया, उसी शिवपुराण क़ो सुनने के लिये इस समय मेरे मन मे बड़ी श्रद्बा हो रही है।23--24।

इत्यक्त्वा साञ्जलिः सा वै सम्प्राय तदनुग्रहम्।
तत्पुराणं श्रोतुकामातिष्ठत्तत्सेवनेः।25।
सूत जी कहते है --

ऐसा कहकर हाथ जोड़ उनका अनुग्रह पाकर चञ्चुला उस शिवपुराण की कथा को सुनने की इच्छा मन में लिये उन ब्राह्मण देवता की सेवा में तत्पर हो वहाँ रहने लगी।25।

अथ शैववरो विप्रस्तस्मिन्नेव स्थले सुधीः।
सत्कथां श्रावयामास तत्पुराणस्य तां स्त्रियम्।26।

तदनंतर शिवभक्तों में श्रेष्ठ और शुद्ध बुद्धि वाले उनज ब्राह्मण देव ने उसी स्थान पर उस स्त्री को शिवपुराण की उत्तम कथा सुनायी।26।

 इत्थं तस्मिन् महाक्षेत्रे तस्मादेव द्विजोत्तमात्।
कथां शिवपुराणस्य सा शुश्राव महोत्तमाम्।27।

 इस प्रकार उस गोकर्ण नामक  महाक्षेत्र में उन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मण से उसने शिवपुराण की वह परम उत्तम कथा सुनी।27।

भक्तिज्ञान विरागाणां वर्धिनीं मुक्ति दायिनीम्।
बभूव सुकृतार्थां सा श्रुत्वा तां सत्कथां पराम्।28।

शिवपुराण की यह कथा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बढाने वाली तथा मुक्ति देने वाली है।इस परम् उत्तम कथा को सुनकर वह2 ब्राह्मण पत्नी अत्यन्त कृतार्थ हो गयी।28।

सदगुरोस्तस्य कृपया शुध्द चित्ता च सा द्रुतम।
शिवानुग्रहतः शम्भोः रूपध्यानमवाप ह।29।

 उसका चित्त शीघ्र ही शुद्ध हो गया। फिर भगवान शिव के अनुग्रह से उसके हृदय मेंभगवान शिव के सगुण रूप का चिंतन  होने लगा।29।

इत्थं सदगुरुमाश्रित्य सा प्राप्त शिवसन्मतिः।
दध्यौ मुहुर्मुहुः शम्भोश्चिदानन्दमयं वपुः।30।

इस प्रकार उसने भगवान शिव में लगी रहने वाली उत्तम बुद्धि पाकर शिव के सच्चिदानंदमय स्वरूप का बारंबार चिंतन आरम्भ किया।30।

अथ कालेन पूर्णेन भक्तित्रिकसमन्विता।
समुत्ससर्ज देहं स्ववमनायासेन चञ्चुला।31।

तत्पश्चात समय के पूरे होने पर भक्ति,ज्ञान और वैराग्य से युक्त हुई चंचुला ने अपने शरीर को बिना किसी कष्ट के त्याग दिया।31।

विमानं द्रुतमायान्तं प्रेषितं त्रिपुरागणा।
दिव्यं स्वगणसंयुक्तं नानाशोभासमन्वितम्।32।

इतने में ही त्रिपुर शत्रु भगवान शिव का भैजा हुआ एक दिव्य विमान द्रुति गति से वहाँ पहुंचा।जो उनके गणों से संयुक्त और  भाँति भाँति के शोभा साधनों से सम्पन्न था।32।

अथ तत्र समारूढा महेशानुचरैर्वरैः।
नीता शिवपुरीं सद्यो ध्वस्त सर्वमला च सा।33।

चंचुला उस विमान पर आरूढ़ हुई और भगवान शिव के श्रेष्ठ पार्षदों ने उसे तत्काल शिवपुरी में पहुंचा दिया।उसके सारे मल धुल गए थे।33।

दिव्यरूपधरा दिव्या दिव्यावयवशालिनी।
*चन्द्रार्धशेखरा गौरी विलतसद्दिव्यभूषणा।34।

 वह दिव्यरूप धारिणी दिव्यांगना हो गयी थी। उसके दिव्य अवयव उसकी शोभा बढ़ाते थे।मस्तक पर अर्धचंद्र का मुकुट धारण किये वह गौरांगी देवी शोभाशाली दिव्य आभूषणों से विभूषित थी।34।

गत्वा तत्र महादेवं सा ददर्शं त्रिलोचनम्।
विष्णुब्रह्मादिभिर्देवैः सेव्यमानं सनातनम्।35।

शिवपुरी में पहुंचकर उसने सनातन देवता त्रिनेत्रधारी महादेवजी को देखा। सभी मुख्य मुख्य देवता उनकी सेवा में खड़े थे।35।

गणेशभृंगिनन्दीश वीरभद्रेश्वरादिभिः।
उपास्यमानं सदभक्त्या कोटिसूर्यसमप्रभं।36।

गणेश, भृंगी, नंदीश्वर तथा वीरभद्रेश्वर आदि उनकी सेवा में उत्तम भक्तिभाव से उपस्थित थे। उनकी अंगकान्ति करोडों सूर्यों के समान प्रकाशित हो रही थी।36।

नीलग्रीवं पञ्चवक्त्रं त्रयंबकं चन्द्रार्धशेखर।
वामांगे विभ्रतंगौरीं विद्युतपुञ्जसमप्रभाम्।37।

कंठ में नील चिह्न शोभा पाता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुख में तीन तीन नेत्र थे। मस्तक पर अर्द्ध चंद्राकार मुकुट शोभा देता था। उन्होंने अपने वामांग भाग में गौरी देवी को बिठा रखा था।जो विद्युत पुंज के समान प्रकाशित थीं।37।

कर्पूर गौरंगौरीशं सर्वालंकारधारिणम।
सितभस्मलसद्देहं सितवस्त्रं महोज्ज्वलं।38।

गौरीपति महादेवजी की कांति कपूर के समान गौर थी। उनका सारा शरीर श्वेत भस्म से भासित था। शरीर पर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे।38।

दृष्टवैवं शंकरं नारी सा मुमोदाति चञ्चुला।
सुसम्भ्रमान्महाषप्रीता प्रणनाम पुनः पुनः।39।

इस प्रकार परम उज्ज्वल भगवान शंकर का दर्शन करके वह ब्राह्मण पत्नी चंचुला बहुत प्रसन्न हुई। अत्यन्त प्रीतियुक्त होकर उसने बढ़ी उतावली के साथ भगवान को बारंबार प्रणाम किया।39।

साञ्जलिः सा मुदा प्रेम्णा सन्तुष्टा च विनीतका।
रोमहर्षसमन्विता।40।

फिर हाथ जोड़कर वह बड़े प्रेम,आनंद और संतोष से युक्त हो विनीत भाव से खड़ी हो गई। उसके नेत्रों से आनंदाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी तथा सम्पूर्ण शरीर मैं रोमांच हो गया।40।

अथ सा वै करुणया पार्वत्या शंकरेण च।
समानीतोपकण्ठं हि सुदृष्ट्या च विलोकिता।41।

उस समय भगवती पार्वती और भगवान शंकर ने उसे बड़ी करुणा के साथ अपने पास बुलाया और सौम्य दृष्टि से उसकी ओर देखा।41।

पार्वत्या सा कृता प्रीत्या स्वसखी दिव्य रुपिणी।
दिव्यसौख्यान्विता तत्र चञ्चुला बिन्दुगप्रिया।42।

पार्वती जी ने तो दिव्यरूप धारिणी बिन्दुगप्रिया चंचुला को प्रेमपूर्वक अपनी सखी बना लिया।।42।

तस्मिँल्लोके परानन्द घनज्योतिषि शाश्वते।
लब्ध्वा निवासमचलं लेभे सुखमनाहतम्।43।

वह उस परमानन्द गहन ज्योतिः स्वरूप सनातन धाम में अविचल निवास पाकर दिव्य सौख्य से सम्पन्न हो अक्षय सुख का अनुभव करने लगी।43।
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इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्य चतुर्थो अध्यायः।।4।।

 ॐ जय बाबा की ॐ || बाबा चरण दास ||